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उ॒त त्यं च॑म॒सं नवं॒ त्वष्टु॑र्दे॒वस्य॒ निष्कृ॑तम्। अक॑र्त च॒तुरः॒ पुनः॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta tyaṁ camasaṁ navaṁ tvaṣṭur devasya niṣkṛtam | akarta caturaḥ punaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। त्यम्। च॒म॒सम्। नव॑म्। त्वष्टुः॑। दे॒वस्य॑। निःऽकृ॑तम्। अक॑र्त। च॒तुरः॑। पुन॒रिति॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:20» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:2» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

उक्त कार्य्य के करने में किसका सामर्थ्य होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - जब विद्वान् लोग जो (त्वष्टुः) शिल्पी अर्थात् कारीगर (देवस्य) विद्वान् का (निष्कृतम्) सिद्ध किया हुआ काम सुख का देनेवाला है, (त्यम्) उस (नवम्) नवीन दृष्टिगोचर कर्म को देखकर (उत) निश्चय से (पुनः) उसके अनुसार फिर (चतुरः) भू, जल, अग्नि और वायु से सिद्ध होनेवाले शिल्पकामों को (अकर्त्त) अच्छी प्रकार सिद्ध करते हैं, तब आनन्दयुक्त होते हैं॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य लोग किसी क्रियाकुशल कारीगर के निकट बैठकर उसकी चतुराई को दृष्टिगोचर करके फिर सुख के साथ कारीगरी काम करने को समर्थ हो सकते हैं॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

एक के चार

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार ऋभु सोम का रक्षण करते हैं , (उत) - और (त्वष्टुः देवस्य) - त्वष्टा देव के , प्रभु ही त्वष्टा हैं "त्विषेर्वा स्याद् दीप्तकर्मणः" वे सब ज्ञानों से दीप्त हैं , "त्विक्षतेर्वा स्यात् करोति कर्मणः" - वे प्रभु सारे ब्रह्माण्ड के रचनेवाले हैं , हमारे इन शरीररूप पिण्डों के बनानेवाले भी वे प्रभु ही हैं , उस त्वष्टा देव के (निष्कृतम्) - [निः शेषेण सम्पादितम्] पूर्णरूप से बनाये हुए , अर्थात् जिसमें किसी प्रकार की कमी नहीं है (त्यम्) - उस (नवम्) - नवीन अथवा स्तुत्य (चमसम्) - इस शरीररूप पात्र को ये ऋभु (पुनः) - फिर (चतुरः) - चतुर्धाविभक्त (अकर्त) - कर देते हैं ।  २. शरीररूप पात्र एक है । भिन्न - भिन्न अङ्गों से बना हुआ यह एक शरीर है जैसे भिन्न - भिन्न प्रान्तों से बना हुआ एक राष्ट्र होता है । यद्यपि यह शरीर एक है , तो भी ये ऋभु इस शरीर को चार भागों में बाटकर चार साधनाएँ करते हैं - [क] ये शरीर के मुख के भाग को ' ब्रह्माण्ड' बनाते हैं , ऊँचे - से - ऊँचा ज्ञान प्राप्त करनेवाला बनाते हैं । इस भाग में स्थित इनकी सभी इन्द्रियाँ ज्ञान - प्राप्तिरूप कार्य में लगी रहती हैं । [ख] भुजाओं व छाती के भाग को ये ' क्षत्रिय' बनाते हैं । भुजाओं में बल का सम्पादन करके ये रक्षा के कार्य में तत्पर होते हैं । [ग] इनका उदरभाग जैसे शरीर में सब रुधिर का निर्माण करता है , उसी प्रकार ये ' धन' के उत्पादन के लिए प्रयत्नशील होते हैं , इस प्रकार उनका यह शरीरभाग "वैश्य' हो जाता है । [घ] निरन्तर श्रम करते हुए पाँवों से यह ' शूद्र' होता है , ' शु द्रवति' शीघ्रता से यह कर्म करनेवाला होता है । ३. इस प्रकार इस शरीर के अङ्ग क्रमशः ' ज्ञान , बल , धन व श्रम' का अर्जन करते हुए इस एक शरीरवाले होते हुए को चारवाला कर देते हैं - यही है एक का चार कर देना । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु प्रभु के बनाये इस पूर्ण व स्तुत्य शरीर को एक होते हुए को भी ज्ञान , बल , धन व श्रम का अर्जन करनेवाला बनाकर चतुर्धा विभक्त कर देते हैं । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

कस्यैतत्करणे सामर्थ्यं भवतीत्युपदिश्यते।

अन्वय:

यदा विद्वांसस्त्वष्टुर्देवस्य त्यं तं निष्कृतं नवं चमसमिदानींतनं प्रत्यक्षं दृष्ट्वोत पुनश्चतुरोऽकर्त्त कुर्वन्ति तदानन्दिता जायन्ते॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि (त्यम्) तम् (चमसम्) चमन्ति भुञ्जते सुखानि येन व्यवहारेण तम्। (नवम्) नवीनम् (त्वष्टुः) शिल्पिनः (देवस्य) विदुषः (निष्कृतम्) नितरां सम्पादितम् (अकर्त्त) कुर्वन्ति। अत्र लडर्थे लुङ्, मन्त्रे घसह्वरणश० इति च्लेर्लुक्, वचनव्यत्ययेन झस्य स्थाने तः, छन्दस्युभयथा इत्यार्धधातुकं मत्वा गुणादेशश्च। (चतुरः) चतुर्विधानि भूजलाग्निवायुभिः सिद्धानि शिल्पकर्माणि (पुनः) पश्चादर्थे॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्याः कस्यचित् क्रियाकुशलस्य शिल्पिनः समीपे स्थित्वा तत्कृतिं प्रत्यक्षीकृत्य सुखेनैव शिल्पसाध्यानि कार्य्याणि कर्त्तुं शक्नुवन्तीति॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When the scholars see a new work of discovery or invention created by Tvashta, a brilliant sophisticated creator of new forms, they advance the work further to fourfold dimensions with the energy of earth, water, fire and wind.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Who is able to do it, is taught in the 6th Mantra.

अन्वय:

When learned persons see with their own eyes the pleasing and new accomplished work of an artist scholar which confers happiness on all, they make it again fourfold by accomplishing works of art made with the earth, water, fire and air.

पदार्थान्वयभाषाः - (चमसम् ) चमन्ति भुंजते सुखानि येन तं व्यवहारम् । = The dealing or the work which confers happiness. (त्वष्टु:) शिल्पिन:= Of an artist. (चतुरा) चतुर्विधानि भूजलाग्निवायुभिः सिद्धानि शिल्पकर्माणि । = The works of art made with the help of the earth, water, fire and air.
भावार्थभाषाः - Men can easily accomplish works of art by associating themselves with (or sitting at the feet of ) an expert artist, having observed his work minutely.
टिप्पणी: Sayanacharya commenting on, the Mantra says त्वष्टुः तक्षणव्यापारकुशलस्य त्वष्टुः शिष्या ऋभवः तेन निर्मित तम् चमसं पुनरपि चतुरः अर्कत || Which Wilson translates as- "The Ribhus have divided into four the new ladle, the work of the divine Twashtri. Griffith also translates in the same way. "The sacrificial ladle wrought newly by the God Twashta's hand. Four ladles have Ye made thereof." There is no sense in it, while as Rishi Dayananda's interpretation is very significant denoting that when an expert artisan makes some articles, his disciples should try to multiply it by the proper application of the earth, water, fire and air. This is the method of technical progress. The word तवष्टा has been interpreted by Rishi Dayananda as शिल्पी an artist or artisan. It is derived from त्वक्षू-तनूकरणे So the meaning given by Rishi Dayananda is denoted by the root. Sayanacharya also indicates this root meaning saying तक्षणव्यापार कुशलस्य त्वष्टु: Expert in carpentry etc. has been interpreted by Rishi Dayananda as विदुष: for which there is clear authority in the Shatapath Brahmana विद्वांसो हि देवाः ( शतपथ ० ३. ७.३.१० )
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसे जेव्हा एखाद्या क्रियेत कुशल असणाऱ्या कारागिराजवळ राहून प्रत्यक्ष त्याची कृती पाहतात तेव्हा चतुराईने कारागिराचे काम करण्यास समर्थ होऊ शकतात. ॥ ६ ॥