उ॒त त्यं च॑म॒सं नवं॒ त्वष्टु॑र्दे॒वस्य॒ निष्कृ॑तम्। अक॑र्त च॒तुरः॒ पुनः॑॥
uta tyaṁ camasaṁ navaṁ tvaṣṭur devasya niṣkṛtam | akarta caturaḥ punaḥ ||
उ॒त। त्यम्। च॒म॒सम्। नव॑म्। त्वष्टुः॑। दे॒वस्य॑। निःऽकृ॑तम्। अक॑र्त। च॒तुरः॑। पुन॒रिति॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
उक्त कार्य्य के करने में किसका सामर्थ्य होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
एक के चार
स्वामी दयानन्द सरस्वती
कस्यैतत्करणे सामर्थ्यं भवतीत्युपदिश्यते।
यदा विद्वांसस्त्वष्टुर्देवस्य त्यं तं निष्कृतं नवं चमसमिदानींतनं प्रत्यक्षं दृष्ट्वोत पुनश्चतुरोऽकर्त्त कुर्वन्ति तदानन्दिता जायन्ते॥६॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Who is able to do it, is taught in the 6th Mantra.
When learned persons see with their own eyes the pleasing and new accomplished work of an artist scholar which confers happiness on all, they make it again fourfold by accomplishing works of art made with the earth, water, fire and air.
