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आ ये त॒न्वन्ति॑ र॒श्मिभि॑स्ति॒रः स॑मु॒द्रमोज॑सा। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā ye tanvanti raśmibhis tiraḥ samudram ojasā | marudbhir agna ā gahi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। ये। त॒न्वन्ति॑। र॒श्मिऽभिः॑। ति॒रः। स॒मु॒द्रम्। ओज॑सा। म॒रुत्ऽभिः॑। अ॒ग्ने॒। आ। ग॒हि॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:19» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:37» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

ये ही प्रकाश आदि गुणों का विस्तार करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो वायु अपने (ओजसा) बल वा वेग से (समुद्रम्) अन्तरिक्ष को प्राप्त होते तथा जलमय समुद्र का (तिरः) तिरस्कार करते हैं, तथा जो (रश्मिभिः) सूर्य्य की किरणों के साथ (आतन्वन्ति) विस्तार को प्राप्त होते हैं, उन (मरुद्भिः) पवनों के साथ (अग्ने) भौतिक अग्नि (आगहि) कार्य्य की सिद्धि को देता है॥८॥
भावार्थभाषाः - इन पवनों की व्याप्ति से सब पदार्थ बढ़कर बल देनेवाले होते हैं, इससे मनुष्यों को वायु और अग्नि के योग से अनेक प्रकार कार्य्यों की सिद्धि करनी चाहिये॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रकाश व ओज

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अग्ने) - अग्रणी पुरुष! तू उन (मरुद्धिः) - प्राणों के साथ (आगहि) - प्रभु के समीप प्राप्त हो , ये जो साधक के जीवन को (रश्मिभिः) - ज्ञान की किरणों से (आतन्वन्ति) - समन्तात् आच्छादित कर देते हैं । प्राणसाधक के जीवन में चारों ओर ज्ञानरश्मियों का विस्तार होता है । प्राणायाम के द्वारा 'ऋतम्भरा प्रज्ञा' की उत्पत्ति होती है , उस बुद्धि का विकास होता है जो सत्य का ही पोषण करती है एवं प्राणसाधक के जीवन में रश्मियों का प्रकाश - ही - प्रकाश होता है ।  २. ये प्राण मनुष्य को ऐसा ओजस्वी बनाते हैं कि यह (ओजसा) - ओज के द्वारा (समुद्रम्) - समुद्र को भी (तिरः) - तिरस्कृत करनेवाला होता है , समुद्र से भी इसकी शक्ति अधिक होती है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से जीवन प्रकाशमय व ओजस्वी बनता है । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

एत एव प्रकाशादिकं विस्तारयन्तीत्युपदिश्यते।

अन्वय:

ये वायव ओजसा समुद्रमन्तरिक्षमागच्छन्ति जलमयं सागरं तिरस्कुर्वन्ति ये च रश्मिभिः सह तन्वन्ति तैर्मरुद्भिः सहाग्ने अग्निरागहि प्राप्तोऽस्ति॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) अनुगतार्थे क्रियायोगे (ये) वायवः (तन्वन्ति) विस्तारयन्ति (रश्मिभिः) सूर्य्यकिरणैः सह (तिरः) तिरस्करणे (समुद्रम्) अन्तरिक्षं जलमयं वा (ओजसा) बलेन वेगेन वा (मरुद्भिः) तैर्धनञ्जयाख्यैः सूक्ष्मैः सह (अग्ने) अग्निः (आ) सर्वतः (गहि) प्राप्नोति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च॥८॥
भावार्थभाषाः - एतेषां वायूनां प्राप्त्या सर्वे पदार्था वर्धित्वा बलहेतवो भवन्ति, तस्मान्मनुष्यैर्वाय्वग्नियोगेनानेका कार्य्यसिद्धिर्विभावनीयेति॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The winds which, with their power, churn the seas, and with their waves of splendour light the sun and expand the space, with those winds, Agni, come and bless.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

These Maruts extend the manifestation of the light is taught in the 8th Mantra.

अन्वय:

The fire comes with the subtle airs named Dhananjaya which with their force spread themselves in the middle region, agitate the ocean and with the rays of the sun, extend their scope.

पदार्थान्वयभाषाः - (मरुदभिः) धनजयाख्यैः सूक्ष्मैः सह = With subtle gases technically named Dhananjaya. (रश्मिभिः) सूर्यकिरणैः सह = With the rays of the sun.
भावार्थभाषाः - With the association of the gases, all articles grow and become full of force. Therefore men should accomplish various purposes with the combination of the fire and air.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या वायूच्या व्याप्तीने सर्व पदार्थ वाढतात, विकसित होतात व बलयुक्त होतात. त्यामुळे माणसांनी वायू व अग्नीच्या योगाने अनेक प्रकारच्या कार्यांची सिद्धी केली पाहिजे. ॥ ८ ॥