ये नाक॒स्याधि॑ रोच॒ने दि॒वि दे॒वास॒ आस॑ते। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥
ye nākasyādhi rocane divi devāsa āsate | marudbhir agna ā gahi ||
ये। नाक॑स्य। अधि॑। रो॒च॒ने। दि॒वि। दे॒वासः। आस॑ते। म॒रुत्ऽभिः॑। अ॒ग्ने॒। आ। ग॒हि॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी उक्त पवन कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
स्वर्गलोक
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते।
ये देवासो नाकस्य रोचने दिव्यध्यासते तद्धारकैः प्रकाशकैर्मरुद्भि सहाग्नेऽयमग्निरागहि सुखानि प्रापयति॥६॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The same subject is continued-
The worlds like the earth and moon depend upon or are illuminated by the brilliant sun. The fire leads to much happiness with the help of the airs.
