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प्र॒थ॒मा हि सु॒वाच॑सा॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी। य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prathamā hi suvācasā hotārā daivyā kavī | yajñaṁ no yakṣatām imam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र॒थ॒मा। हि। सु॒ऽवाच॑सा। होता॑रा। दैव्या॑। क॒वी इति॑। य॒ज्ञम्। नः॒। य॒क्ष॒ता॒म्। इ॒मम् ॥ १.१८८.७

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:188» मन्त्र:7 | अष्टक:2» अध्याय:5» वर्ग:9» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:24» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (हि) जिस कारण (होतारा) ग्रहणकर्त्ता (दैव्या) दिव्य बोधों में कुशल (प्रथमा) प्रथम विद्या बल को बढ़ानेवाले (सुवाचसा) सुन्दर जिनका वचन (कवी) जो सकल विद्या के वेत्ता अध्यापकोपदेशक जन हैं वे (नः) हमारे (इमम्) इस प्रत्यक्षता से वर्त्तमान (यज्ञम्) धनादि पदार्थों के मेल कराने वा व्यवहार का (यज्ञताम्) सङ्ग करावें ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - इस संसार में जो जिनका उपकार करते हैं, वे उनको सत्कार करने योग्य होते हैं ॥ ७ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिन व रात हमारे जीवन-यज्ञ के होता हों

पदार्थान्वयभाषाः - १. (प्रथमा) = [प्रथ विस्तारे] ये दिन व रात हमारे लिए शक्तियों का विस्तार करनेवाले हों । (हि) = निश्चय से (सुवाचसा) = उत्तम वचनों वाले हों- हम दिन व रात्रि दोनों के प्रारम्भ में प्रभु के गुणों का उत्तमता से उच्चारण करनेवाले हों, (होतारा) = ये दोनों हमारे जीवन-यज्ञ के होता हों अथवा हम इनमें दानपूर्वक अदनवाले हों। इस होतृत्व के द्वारा ये (दैव्या) = उस देव की ओर हमें ले-चलनेवाले हों और उस देव की ओर चलते हुए हम (कवी) = क्रान्तदर्शी व क्रान्तप्रज्ञ हों । २. इस प्रकार ये दिन व रात हमारे लिए 'प्रथमा, सुवाचसा, होतारा, दैव्या, कवी' होते हुए (नः) = हमारे (इमम्) = इस (यज्ञम्) = जीवन-यज्ञ को (यक्षताम्) = [यजताम्] सम्पन्न करनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - दिन-रात यज्ञमय जीवन बिताते हुए हम अपनी शक्तियों का विस्तार करें, दोनों समय प्रभु का गुणगान करें, अग्निहोत्र करें, प्रभु की ओर चलनेवाले हों और क्रान्तप्रज्ञ बनें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे मनुष्या हि यतो होतारा दैव्या प्रथमा सुवाचसा कवी न इमं यज्ञं यक्षताम् ॥ ७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रथमा) आदिमौ विद्याबलविस्तारकौ (हि) यतः (सुवाचसा) शोभनं वाचो वचनं ययोस्तौ (होतारा) आदातारौ (दैव्या) देवेषु दिव्येषु बोधेषु कुशलौ (कवी) सकलविद्यावेत्तारावध्यापकोपदेशकौ (यज्ञम्) धनादिसङ्गमकम् (नः) अस्माकम् (यक्षताम्) सङ्गमयताम् (इमम्) प्रत्यक्षतया वर्त्तमानम् ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र ये येषामुपकारं कुर्वन्ति तैस्ते सत्कर्त्तव्या भवन्ति ॥ ७ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May two Yajakas, old and ancient, first and best, masters of noble speech, divine of nature, scholars of poetic visionaries such as the Ashvins or the teacher and preacher, come and grace this yajna of ours unto a splendid completion.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The benefactors are invariably respected.

अन्वय:

O men! these teachers and preachers are augmenters of knowledge and strength. They are of noble speech, wise and know all sciences. Let such persons, endowed with divine virtues and acceptors of every good thing, accomplish this our YAJNA (good act), for it leads us to prosperity.

पदार्थान्वयभाषाः - NA
भावार्थभाषाः - Those who do good to others, must be respected by them in return.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या जगात जे उपकार करतात ते सत्कार करण्यायोग्य असतात. ॥ ७ ॥