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यद॒दो पि॑तो॒ अज॑गन्वि॒वस्व॒ पर्व॑तानाम्। अत्रा॑ चिन्नो मधो पि॒तोऽरं॑ भ॒क्षाय॑ गम्याः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad ado pito ajagan vivasva parvatānām | atrā cin no madho pito ram bhakṣāya gamyāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत्। अ॒दः। पि॒तो॒ इति॑। अज॑गन्। वि॒वस्व॑। पर्व॑तानाम्। अत्र॑। चि॒त्। नः॒। म॒धो॒ इति॑। पि॒तो॒ इति॑। अर॑म्। भ॒क्षाय॑। ग॒म्याः॒ ॥ १.१८७.७

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:187» मन्त्र:7 | अष्टक:2» अध्याय:5» वर्ग:7» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:24» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पितो) अन्नव्यापिन् पालकेश्वर ! (यत्) जिस (अदः) प्रत्यक्ष अन्न को विद्वान् जन (अजगन्) प्राप्त होते हैं उसमें (विवस्व) व्याप्तिमान् हूजिये। हे (मधो) मधुर (पितो) पालकान्नदाता ईश्वर ! (अत्र, चित्) इन (पर्वतानाम्) मेघों के बीच भी जो कि अन्न के निमित्त कहे हैं (नः) हमारे (भक्षाय) भक्षण करने के लिये अन्न को (अरम्) परिपूर्ण (गम्याः) प्राप्त कराइये ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - सब पदार्थों में व्याप्त परमेश्वर को भक्षण आदि समय में स्मरण करे, जिस कारण जिस परमात्मा की कृपा से अन्नादि पदार्थ विविध प्रकार के पूर्वादि दिशा, देश और काल के अनुकूल वर्त्तमान हैं, उस परमात्मा ही का संस्मरण कर सब पदार्थ ग्रहण करने चाहियें ॥ ७ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मेघ-जल से उत्पन्न अन्न

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (पितो) = अन्न ! (यत्) = जब तू (विवस्व) = [विवासनवतां विद्युद्रूपप्रकाशनवताम्- सा०] विद्युद्रूप प्रकाशवाले (पर्वतानाम्) = मेघों के (अदः) = उस प्रसिद्ध अमृतजल को (अजगन्) = प्राप्त होता है तो (अत्र) = यहाँ, इस जीवन में (चित्) = निश्चय से (न:) = हमें (भक्षाय) = खाने के लिए (अरम्) = पर्याप्त (मधो पितो) = हे सारभूत अन्न ! तू (गम्याः) = प्राप्त हो । २. मेघ-जल से उत्पन्न अन्न अधिक गुणकारी हैं। मेघजल 'अमृत' है। उससे उत्पन्न अन्न भी अमृत है। मात्रा में यह अन्न सम्भवतः कम होगा, पर गुणों में यह अन्न अत्यन्त उत्कृष्ट है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मेघजल से उत्पन्न अन्नों का सेवन करनेवाले बनें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे पितो यददो पितोऽन्नं विद्वांसोऽजगन् तत्र विवस्व। हे मधो पितो अत्र चित् पर्वतानां मध्ये नो भक्षायाऽन्नमरं गम्याः ॥ ७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) (अदः) तत्। अत्र वाच्छन्दसीत्यप्राप्तमप्युत्वम्। (पितो) (अजगन्) गच्छन्ति (विवस्व) विशेषेण वस। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम्। (पर्वतानाम्) मेघानाम् (अत्र) अस्मिन्। अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (चित्) अपि (नः) अस्माकम् (मधो) मधुर (पिता) पालकान्नदातः (अरम्) अलम् (भक्षाय) भोजनाय (गम्याः) प्रापयेः ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - सर्वेषु पदार्थेषु व्याप्तं परमेश्वरं भक्षणादिसमये संस्मरेद्यस्य परमात्मनो हि कृपयान्नानि विविधानि सर्वत्र दिग्देशकालानुकूलानि वर्त्तन्ते तं परमात्मानमेव संस्मृत्य सर्वे पदार्था ग्रहीतव्या इति ॥ ७ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O spirit pervasive and food of energy in the process of nature’s metabolism, when the clouds move, be there in them, enrich and energise them and, then, O honey sweet food of life, come here down from the clouds and be with us for us to our heart’s desire.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Remember God when take your meals.

अन्वय:

O Omnipresent God! you give us the food. Be established in the hearts of those wisemen, who know the qualities of proper food, such people dwell happily on earth. O Sweet Protector and Giver of food! grant us sufficient food for our maintenance through the clouds (rains) which produce vast crops.

पदार्थान्वयभाषाः - NA
भावार्थभाषाः - One should always remember Omnipresent God at the time of taking meals, by whose grace, all crops and food grains become worth of eating. One should begin to take suitable good food only after remembering and thanking God.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सर्व पदार्थात व्याप्त असलेल्या परमेश्वराचे भोजन इत्यादी करताना स्मरण करावे. परमेश्वराच्या कृपेने अन्न इत्यादी पदार्थ, विविध प्रकारच्या पूर्व इत्यादी दिशा, देश, काळ विद्यमान आहेत. त्या परमेश्वराचे संस्मरण करून सर्व पदार्थांचे ग्रहण करावे. ॥ ७ ॥