वांछित मन्त्र चुनें

अव॑विद्धं तौ॒ग्र्यम॒प्स्व१॒॑न्तर॑नारम्भ॒णे तम॑सि॒ प्रवि॑द्धम्। चत॑स्रो॒ नावो॒ जठ॑लस्य॒ जुष्टा॒ उद॒श्विभ्या॑मिषि॒ताः पा॑रयन्ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

avaviddhaṁ taugryam apsv antar anārambhaṇe tamasi praviddham | catasro nāvo jaṭhalasya juṣṭā ud aśvibhyām iṣitāḥ pārayanti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अव॑ऽविद्धम्। तौ॒ग्र्यम्। अ॒प्ऽसु। अ॒न्तः। अ॒ना॒र॒म्भ॒णे। तम॑सि। प्रऽवि॑द्धम्। चत॑स्रः। नावः॑। जठ॑लस्य। जुष्टाः॑। उत्। अ॒श्विऽभ्या॑म्। इ॒षि॒ताः। पा॒र॒य॒न्ति॒ ॥ १.१८२.६

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:182» मन्त्र:6 | अष्टक:2» अध्याय:4» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:24» मन्त्र:6


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर नौकादि यान विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - जो (अश्विभ्याम्) वायु और अग्नि से (इषिताः) प्रेरणा दी हुई अर्थात् पवन और अग्नि के बल से चली हुई एक एक चौतरफी (चतस्रः) चार चार (नावः) नावें (जठलस्य) उदर के समान समुद्र में (जुष्टाः) की हुई (अनारम्भणे) जिसका अविद्यमान आरम्भण उस (तमसि) अन्धकार में (प्रविद्धम्) अच्छे प्रकार व्यथित (अप्सु) जलों के (अन्तः) भीतर (अवविद्धम्) विशेष पीड़ा पाये हुए (तौग्र्यम्) बल को ग्रहण करनेवालों में प्रसिद्ध जन को (उत्पारयन्ति) उत्तमता से पार पहुँचाती हैं, वे विद्वानों को बनानी चाहिये ॥ ६ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य जब नौका में बैठके समुद्र के मार्ग से जाने की इच्छा करें, तब बड़ी नाव के साथ छोटी नावें जोड़ समुद्र में जाना-आना करें ॥ ६ ॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वेदरूप नौकाचतुष्टय

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अप्सु अन्तः) = इस भवसागर के विषय-जलों में (अवविद्धम्) = वासनारूप शत्रुओं से बींधकर नीचे गिराये हुए, अतएव गोते खाते हुए (अनारम्भणे) = आश्रय से शून्य (तमसि) = अज्ञान के अन्धकार में (प्रविद्धम्) = वासना के शरों से घायल हुए हुए (तौग्र्यम्) = तुग्र्य को (जठलस्य) = [जठरवत् धारकस्य - सा०] सारे ब्रह्माण्ड को अपने जठर [पेट] में धारण करनेवाले प्रभु की (चतस्त्रः नाव:) = चारों वेदों के रूप में ज्ञान की चार नौकाएँ (जुष्टाः) = प्रीतिपूर्वक सेवन की हुईं तथा (अश्विभ्याम्) = प्राणापानों से (इषिताः) = प्रेरित की हुईं उत्पारयन्ति समुद्र के पार लगानेवाली होती हैं । २. ये ज्ञान की नावें अन्धकार को नष्ट करके वासनाओं को समाप्त कर देती हैं। वासनाओं का विनाश हमें विषय-जल में डूबने से बचा देता है। ये ज्ञान की नावें प्राणापान से प्रेरित होती हैं अर्थात् प्राणसाधना से मलक्षय होकर ज्ञानदीप्ति होती है। इस साधना से बुद्धि तीव्र होकर सूक्ष्म विषयों का ग्रहण करनेवाली बनती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की वेदरूप ज्ञान की वाणियाँ चार नावें हैं जो हमें संसार-सागर के विषयरूप जलों में डूबने से बचाती हैं ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्नौकादियानविषयमाह ।

अन्वय:

या अश्विभ्यामिषिताः एकैकस्या अभितश्चतस्रो नावो जठलस्य मध्य इव समुद्रे जुष्टा अनारम्भणे तमसि प्रविद्धमप्स्वन्तरवविद्धन्तौग्र्यमुत्पारयन्ति ता विद्वद्भिर्निर्मातव्याः ॥ ६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अवविद्धम्) अवताडितम् (तौग्र्यम्) बलदातृषु भवम् (अप्सु) जलेष्वन्तरिक्षे वा (अन्तः) मध्ये (अनारम्भणे) अविद्यमानमारम्भणं यस्य तस्मिन् (तमसि) अन्धकारे (प्रविद्धम्) प्रकर्षेण व्यथितम् (चतस्रः) एतत्संख्याकाः (नावः) पार्श्वस्था नौकाः (जठलस्य) जठरस्य उदरस्य मध्ये (जुष्टाः) सेविताः (उत्) (अश्विभ्याम्) वाय्वग्निभ्याम् (इषिताः) प्रेरिताः (पारयन्ति) पारं गमयन्ति ॥ ६ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्या यदा नौकायां स्थित्वा समुद्रमार्गेण गन्तुमिच्छेयुस्तदा महत्या नावा सह ह्रस्वाः सम्बद्ध्य समुद्रमध्ये गमनागमने कुर्युः ॥ ६ ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Confined, surrounded and plunged in impenetrable darkness is the team of the mighty marine force. Four boats powered and driven by the Ashvins assigned for the mid-ocean operation rescue the team and safely bring it ashore.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

More about the sea navigation.

अन्वय:

Four boats launched in the receptacle of the waters (sea) around one steamer/ship are driven by the force of wind and fire (steam). They carry safe to shore a strong team of men who otherwise may have drowned into the waters and plunged in complete darkness.

भावार्थभाषाः - When men desire to undertake a voyage into the sea, seated in a big boat or ship, they should tie some small boats with a big steamer or ship and thus go across the ocean safely.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणूस जेव्हा नावेत बसून समुद्रमार्गाने जाण्याची इच्छा करतो तेव्हा मोठ्या नावेबरोबर छोट्या छोट्या नावा जोडून समुद्रात जाणे-येणे करावे. ॥ ६ ॥