यु॒वं पय॑ उ॒स्रिया॑यामधत्तं प॒क्वमा॒माया॒मव॒ पूर्व्यं॒ गोः। अ॒न्तर्यद्व॒निनो॑ वामृतप्सू ह्वा॒रो न शुचि॒र्यज॑ते ह॒विष्मा॑न् ॥
yuvam paya usriyāyām adhattam pakvam āmāyām ava pūrvyaṁ goḥ | antar yad vanino vām ṛtapsū hvāro na śucir yajate haviṣmān ||
यु॒वम्। पयः॑। उ॒स्रिया॑याम्। अ॒ध॒त्त॒म्। प॒क्वम्। आ॒माया॑म्। अव॑। पूर्व्य॑म्। गोः। अ॒न्तः। यत्। व॒निनः॑। वा॒म्। ऋ॒त॒प्सू॒ इत्यृ॑तऽप्सू। ह्वा॒रः। न। शुचिः॑। यज॑ते। ह॒विष्मा॑न् ॥ १.१८०.३
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
१. हे प्राणापानो! आप ही (गो:) = इस वेदवाणी के (पूर्व्यम्) = सृष्टि के आरम्भ में दिये जानेवाले (पक्वम्) = पूर्ण परिपक्व (पयः) = ज्ञानदुग्ध को हमारी इस (आमायाम्) = अपरिपक्व बुद्धि में (उस्त्रियायाम्) = [brightness, light] प्रकाश के निमित्त (अवाधत्तम्) = स्थापित करते हो । वेदज्ञान सृष्टि के आरम्भ में दिये जाने से पूर्व्य' है, भ्रान्तिशून्य, पूर्ण होने से यह पक्व है। हमारी अपरिपक्व बुद्धि में इसकी स्थापना प्राणसाधना के द्वारा होती है। इसके स्थापित होने पर हमारी बुद्धि प्रकाशित हो उठती है। २. (यत्) = जब (वाम्) = आप दोनों (वनिन:) = उपासक के (अन्तः) = अन्दर (ऋतप्सू) = [One whose form is truth] सत्य स्वरूपवाले होते हो तो वह उपासक (न ह्वारः) = कुटिल नहीं होता–कुटिलता को छोड़कर सरलता को अपनाता है, (शुचिः) = पवित्र होता है, सुपथ से ही धनार्जन करता है 'योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारि शुचिः शुचिः । (यजते) = यह यज्ञशील होता है, यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त रहता है, (हविष्मान्) = उत्तम हविवाला बनता है, सदा त्यागपूर्वक अदनवाला होता है [हु दानादनयोः] । प्राण से जीवन दग्धदोष होकर पवित्र हो जाता है, इसीलिए प्राणापानों को यहाँ 'ऋतप्सु' कहा गया है। - सदा
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह ।
हे ऋतप्सू युवं शुचिर्हविष्मान् ह्वारो न वामुस्रियायां पयो आमायां पक्वं गोः पूर्व्यं वनिनो यद्यजतेन्तरस्ति तदवाधत्तम् ॥ ३ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
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