पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र का ऋषि , जिसने पाप से अपने रक्षण के लिए आचार्य से 'ज्ञान , सौम्यता व जितेन्द्रियता' का ग्रहण करके गृहस्थ में दक्षिणा - दानवृत्ति को स्वीकार किया था और यज्ञमय जीवन बिताते हुए यथासम्भव पापों से अपना रक्षण किया था , वह वनस्थ होता हुआ प्रभु से 'मेधा' की याचना करता है - (मेधाम्) - बुद्धि को (अयासिषम्) - माँगता हूँ , प्राप्त करता हूँ । उस प्रभु से मैं बुद्धि को प्राप्त करता हूँ जो कि (सदसस्पतिम्) [सदसी द्यावापृथिव्योर्नाम , नि० ३.३०] - द्युलोक और पृथिवीलोक के , सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रक्षक हैं । वे मुझे भी बुद्धि देकर रक्षित करते हैं । (अद्भुतम्) - वे प्रभु अद्भुत हैं , संसार में उस प्रभु की उपमा मिलना सम्भव ही नहीं । (प्रियम्) - [प्रीणाति] वे हमें उत्तमोत्तम पदार्थों को देकर प्रीणित करनेवाले हैं । (इन्द्रस्य काम्यम्) - जितेन्द्रिय पुरुष से चाहने योग्य है तथा (सनिम्) - सब आवश्यक पदार्थों के देनेवाले हैं । इस प्रभु से ही मैं मेधा को प्राप्त करता हूँ और इस मेधा द्वारा इस संसार के बीहड़ मार्ग में अपना रक्षण करता हुआ आगे बढ़ता हूँ । २. मेधा के अभाव में हमारा जीवन विचित्र - सा बन जाता है । वहाँ चहल - पहल होती है , चमक - दमक होती है , उसकी रोशनी में आँखें चंधिया जाती है , परन्तु एक अनासक्त भाव से देखनेवाले को भर्तृहरि के शब्दों में वहाँ 'मोह , प्रमाद - मदिरा व उन्मत्तता' ही दिखाई देती है । एक महात्मा के शब्दों में हम थोड़ी देर भौंक - भौंककर मृत्यु की शान्ति में चले जाते हैं , वास्तव में यह कोई जीवन नहीं होता , अतः मैं प्रभु से इस मेधा को ही प्राप्त करता हूँ , जिससे मेरा जीवन सरल व पूर्ण स्वस्थ बना रहे । ३. इस मेधा को प्राप्त करके मैं भी 'सदसस्पति' - द्युलोक व पृथिवीलोक का पति बनें , मस्तिष्क व शरीर दोनों को स्वस्थ रक्खें , अद्भुत बनें । इस जीवन में अभूतपूर्व उन्नति करनेवाला बनूं । (प्रियम्) - प्रिय स्वभाववाला होऊँ और औरों से चाहने योग्य बनें , औरों को मेरे सम्पर्क में आनन्द का अनुभव हो । (सनि) - सदा देनेवाला बनूं । देकर बचे हुए को खाना ही तो वास्तविक संस्कृति है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु से बुद्धि को प्राप्त करके मैं अपने जीवन को कभी वासना - विहिंसित न होने दूं ।