इन्द्र , ब्रह्मणस्पति , सोम [आचार्य]
पदार्थान्वयभाषाः - १. वस्तुतः (सः) - वह (वीरः) - वीर विद्यार्थी (घा) - निश्चय से (न रिष्यति) - कभी हिंसित नहीं होता (यम्) - जिस (मर्त्यम्) - मरणधर्मा पुरुष को (इन्द्रः) - इन्द्र , (ब्रह्मणस्पतिः) - ज्ञान का स्वामी तथा (सोमः) - सोम (हिनोति) - बढ़ाता है ।
२. सामान्यतः एक विद्यार्थी का अपरिपक्व मन प्रभाव को शीघ्र ग्रहण करनेवाला होता है । वह किसी भी बात से प्रभावित हो सकता है । कुसंग में फंसकर वह वैषयिक भावों से शीघ्र आक्रान्त हो जाता है , अतः उसे यहाँ (मर्त्यः) - मर जानेवाला कहा है , परन्तु यही विद्यार्थी जब जितेन्द्रिय [इन्द्र] , ज्ञानी [ब्रह्मणस्पति] व नातिमानी - निरभिमानी [सोम] आचार्य के सम्पर्क में आता है तब यह दूषित विचारों का शिकार नहीं होता । आचार्य इसके ज्ञान को इतना बढ़ा देते हैं कि वह कुविचारों के प्रभाव से ऊपर उठ जाता है , अवाञ्छनीय भावों से लड़ने के लिए उसमें पर्याप्त वीरता उत्पन्न हो जाती है ।
३. आचार्य का सर्वप्रथम गुण 'इन्द्र' शब्द से व्यक्त हो रहा है - वह पूर्ण जितेन्द्रिय है , वह इन्द्रियों का दास नहीं , उसे किसी विषय का चस्का नहीं लगा हुआ , आसुरी वृत्तियों का संहार करके वह दैवी सम्पति का स्वामी बना है ।
४. आचार्य का द्वितीय गुण 'ब्रह्मणस्पति' शब्द के साथ व्यक्त हो रहा है । वह ज्ञान का पति है । ज्ञान का पति होकर ही तो वह विद्यार्थी को ज्ञान दे पाता है ।
५. उसका तीसरा महत्वपूर्ण गुण 'सोम' शब्द से व्यक्त किया जा रहा है । वह जितेन्द्रिय व ज्ञानी बनकर अत्यन्त सौम्य है । उसमें विनीतता है । यह विनीतता ही तो दैवी सम्पत्ति की पराकाष्ठा है । दैवी सम्पत् की समाप्ति 'नातिमानिता' पर ही है । जितेन्द्रियता के द्वारा वह ज्ञानी बनता है , ज्ञान को प्राप्त करके विनीत होता है । जितेन्द्रियता ज्ञान का साधन है और विनीतता ज्ञान का परिणाम । इस आचार्य के शिक्षण में विद्यार्थी वीर बनता है और हिंसित नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जितेन्द्रिय , ज्ञानी , विनीत आचार्य विद्यार्थी को वीर व हिंसित न होनेवाला बनाता है ।