सो॒मानं॒ स्वर॑णं कृणु॒हि ब्र॑ह्मणस्पते। क॒क्षीव॑न्तं॒ य औ॑शि॒जः॥
somānaṁ svaraṇaṁ kṛṇuhi brahmaṇas pate | kakṣīvantaṁ ya auśijaḥ ||
सो॒मान॑म्। स्वर॑णम्। कृ॒णु॒हि। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒। क॒क्षीव॑न्तम्। यः। औ॒शि॒जः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अठारहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके पहले मन्त्र में यजमान ईश्वर की प्रार्थना कैसी करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सोमा - स्वरण - कक्षीवान - औशिज [विद्यार्थी]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्रादौ यजमानेनेश्वरप्रार्थना कीदृशी कार्य्येत्युपदिश्यते।
हे ब्रह्मणस्पते ! योऽहमौशिजोऽस्मि तं मां सोमानं स्वरणं कक्षीवन्तं कृणुहि॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What sort of prayer should Yajamana offer to God is taught in the first Mantra-
O Lord of knowledge, make me who am the son of learned person ever dwelling in light, the performer of the Yajna (non-violent sacrifices) to the teacher of the real relation between a word and its meaning and an artist well-versed in various arts and crafts.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)पूर्वीच्या सतराव्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर मित्र व वरुण यांच्याबरोबर अनुयोगी बृहस्पती इत्यादी अर्थाच्या प्रतिपादनाने या अठराव्या सूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणली पाहिजे. ॥
