मत्सि॑ नो॒ वस्य॑इष्टय॒ इन्द्र॑मिन्दो॒ वृषा वि॑श। ऋ॒घा॒यमा॑ण इन्वसि॒ शत्रु॒मन्ति॒ न वि॑न्दसि ॥
matsi no vasyaïṣṭaya indram indo vṛṣā viśa | ṛghāyamāṇa invasi śatrum anti na vindasi ||
मत्सि॑। नः॒। वस्यः॑ऽइष्टये। इन्द्र॑म्। इ॒न्दो॒ इति॑। वृषा॑। आ। वि॒श॒। ऋ॒घा॒यमा॑णः। इ॒न्व॒सि॒। शत्रु॑म्। अन्ति॑। न। वि॒न्द॒सि॒ ॥ १.१७६.१
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब एकसौ छिहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजविषय में विद्यानुकूल पुरुषार्थ योग को कहते हैं ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सोम का शरीर में प्रवेश
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राजविषये विद्यापुरुषार्थयोगमाह ।
हे इन्दो चन्द्रइव वर्त्तमानन्यायेश वृषाया ऋघायमाणस्त्वं नो वस्यइष्टये इन्द्रं प्राप्य मत्सि शत्रुमिन्वसि। अन्ति न विन्दसि स त्वं सेनामाविश ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The essential qualities of knowledge and industriousness for a king is underlined.
O dispenser of justice ! you are like the moon, growing in every way, day by day, after full dark night. You become delighted on having acquired prosperity for uniting us. You are the annihilator of enemies. Treat the army and warriors with justice.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विद्या, पुरुषार्थ व योगाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
