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आ न॑स्ते गन्तु मत्स॒रो वृषा॒ मदो॒ वरे॑ण्यः। स॒हावाँ॑ इन्द्र सान॒सिः पृ॑तना॒षाळम॑र्त्यः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā nas te gantu matsaro vṛṣā mado vareṇyaḥ | sahāvām̐ indra sānasiḥ pṛtanāṣāḻ amartyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। नः॒। ते॒। ग॒न्तु॒। म॒त्स॒रः। वृषा॑। मदः॑। वरे॑ण्यः। स॒हऽवा॑न्। इ॒न्द्र॒। सा॒न॒सिः। पृ॒त॒ना॒षाट्। अम॑र्त्यः ॥ १.१७५.२

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:175» मन्त्र:2 | अष्टक:2» अध्याय:4» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:23» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) सभापति ! (ते) आपका जो (मत्सरः) सुख करनेवाला (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य (वृषा) वीर्यकारी (सहावान्) जिसमें बहुत सहनशीलता विद्यमान (सानसिः) जो अच्छे प्रकार रोगों का विभाग करनेवाला (पृतनाषाट्) जिससे मनुष्यों की सेना को सहते हैं और (अमर्त्यः) जो मनुष्य स्वभाव से विलक्षण (मदः) ओषधियों का रस है वह (नः) हम लोगों को (आ, गन्तु) प्राप्त हो ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि आप्त धर्मात्मा जनों का ओषधि रस हमको प्राप्त हो, ऐसी सदा चाहना करें ॥ २ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अमर्त्यता का साधन 'सोम'

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (न:) = हमें (ते) = आपका यह सोम (आगन्तु) = प्राप्त हो । यह (मत्सरः) = आनन्द का सञ्चार करनेवाला है, (वृषा) = सुखों का वर्षण करनेवाला है, (मदः) = तृप्ति देनेवाला है, (वरेण्यः) = वरणीय है, चाहने योग्य है, (सहावान्) = रोग- कृमिरूप शत्रुओं का मर्षण करनेवाली शक्ति को देनेवाला है, अतएव (सानसिः) = सम्भजनीय है। २. यह सोम (पृतनाषाट्) = रोगकृमिरूप शत्रु- सैन्य का अभिभव [विनाश] करनेवाला है तथा (अमर्त्यः) = हमें रोगरूप मृत्युओं से न मरने देनेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम सुरक्षित होने पर रोगकृमिरूप शत्रुओं को नष्ट करके हमें 'अमर्त्य' बनाता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे इन्द्र ते यो मत्सरो वरेण्यो वृषा सहावान् सानसिः पृतनाषाडमर्त्यो मदोऽस्ति स नोऽस्माना गन्तु ॥ २ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) समन्तात् (नः) अस्मान् (ते) तव (गन्तु) प्राप्नोतु (मत्सरः) सुखकरः (वृषा) वीर्यकारी (मदः) औषधिसारः (वरेण्यः) वर्त्तुं स्वीकर्त्तुमर्हः (सहावान्) सहो बहुसहनं विद्यते यस्मिन् सः। अत्राऽन्येषामपीत्युपधादीर्घः। (इन्द्र) सभेश (सानसिः) संविभाजकः (पृतनाषाट्) पृतनां नृसेनां सहते येन सः (अमर्त्यः) मनुष्यस्वभावाद्विलक्षणः ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैराप्तानां धर्मात्मनामोषधिरसोऽस्मान् प्राप्नोत्विति सदैवेषितव्यम् ॥ २ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O for a draught of soma, that exciting, ener gising, ecstatic, cherished, strengthening, invigorating and immortal nectar of yours, Indra, which leads us on to victory over all the antilife forces of the world! May it come to us in plenty!
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The Divine Bliss is prayed.

अन्वय:

O Indra - President of the Assembly ! may we also have that Soma (juice of nourishing herbs) which is exhilarating, good and invigorating. It is the most acceptable enjoyable, and conqueror over enemies, and gives the power of endurance. You are different from the nature of ordinary persons and are wonderful.

भावार्थभाषाः - Men should desire that the medicinal juice prepared by the learned, righteous and absolutely truthful persons may be obtained by them also.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - आप्त, धर्मात्मा लोकांच्या औषधी आम्हाला प्राप्त व्हाव्यात अशी माणसांनी सदैव इच्छा धरावी. ॥ २ ॥