तृ॒ण॒स्क॒न्दस्य॒ नु विश॒: परि॑ वृङ्क्त सुदानवः। ऊ॒र्ध्वान्न॑: कर्त जी॒वसे॑ ॥
tṛṇaskandasya nu viśaḥ pari vṛṅkta sudānavaḥ | ūrdhvān naḥ karta jīvase ||
तृ॒ण॒ऽस्क॒न्दस्य॑। नु। विशः॑। परि॑। वृ॒ङ्क्त॒। सु॒ऽदा॒न॒वः॒। ऊ॒र्ध्वान्। नः॒। क॒र्त॒। जी॒वसे॑ ॥ १.१७२.३
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
तृणस्कन्द का उत्कृष्ट जीवन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह ।
हे सुदानवो यूयं तृणस्कन्दस्य विशो नु परि वृङ्क्त जीवसे नो ऊर्द्ध्वान् कर्त्त ॥ ३ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The qualities of noble persons are re-emphasized.
O liberal donor ! protect my people who are strong like the wind that moves the grass. Lift us up, so that we may live happily.
