चि॒त्रो वो॑ऽस्तु॒ याम॑श्चि॒त्र ऊ॒ती सु॑दानवः। मरु॑तो॒ अहि॑भानवः ॥
citro vo stu yāmaś citra ūtī sudānavaḥ | maruto ahibhānavaḥ ||
चि॒त्रः। वः॒। अ॒स्तु॒। यामः॑। चि॒त्रः। ऊ॒ती। सु॒ऽदा॒न॒वः॒। मरु॑तः। अहि॑ऽभानवः ॥ १.१७२.१
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब तीन ऋचावाले एकसौ बहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में पवन के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों का वर्णन करते हैं ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'सुदानवः,अहिभानवः '
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ वायुदृष्टान्तेन विद्वद्गुणानाह ।
हे ऊती सह वर्त्तमाना अहिभानवः सुदानवो मरुतो यथा वायूनां चित्रो यामश्चित्रः स्वभावोऽस्ति तथा वोऽस्तु ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of the learned persons with illustration of the air.
O Protecting Maruts! you are learned and brave persons and dear to us like our Pranas or vital breaths. You are inseparable splendor and illuminators of the nature of clouds etc. May your march be marvelous. O liberal donors! as the movements of the air are wonderful and their nature is marvelous, so let it be yours too.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात वायूप्रमाणे विद्वानांच्या गुणांची प्रशंसा असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागील सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे. ॥
