वांछित मन्त्र चुनें

गन्ता॑रा॒ हि स्थोऽव॑से॒ हवं॒ विप्र॑स्य॒ माव॑तः। ध॒र्तारा॑ चर्षणी॒नाम्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

gantārā hi stho vase havaṁ viprasya māvataḥ | dhartārā carṣaṇīnām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गन्ता॑राः। हि। स्थः। अव॑से। हव॑म्। विप्र॑स्य। माव॑तः। ध॒र्तारा॑ च॒र्ष॒णी॒नाम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:17» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:32» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:4» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब इन्द्र और वरुण से संयुक्त किये हुए अग्नि और जल के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - जो (हि) निश्चय करके ये सम्प्रयोग किये हुए अग्नि और जल (मावतः) मेरे समान पण्डित तथा (विप्रस्य) बुद्धिमान् विद्वान् के (हवम्) पदार्थों का लेना-देना करानेवाले होम वा शिल्प व्यवहार को (गन्तारा) प्राप्त होते तथा (चर्षणीनाम्) पदार्थों के उठानेवाले मनुष्य आदि जीवों के (धर्त्तारा) धारण करनेवाले (स्थः) होते हैं, इससे मैं इनको अपने सब कामों की (अवसे) क्रिया की सिद्धि के लिये (आवृणे) स्वीकार करता हूँ॥२॥
भावार्थभाषाः - पूर्वमन्त्र से इस मन्त्र में आवृणे इस पद का ग्रहण किया है। विद्वानों से युक्ति के साथ कलायन्त्रों में युक्त किये हुए अग्नि-जल जब कलाओं से बल में आते हैं, तब रथों को शीघ्र चलाने, उनमें बैठे हुए मनुष्य आदि प्राणी पदार्थों के धारण कराने और सबको सुख देनेवाले होते हैं॥२॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विप्र - मावान् - चर्षणि

पदार्थान्वयभाषाः - १. इन्द्र और वरुण (हि) - निश्चय से (विप्रस्य) - [वि+प्रा] अपना विशेषरूप से पूर्ण करनेवाले तथा (मा-वतः) - ज्ञानी के [मा - प्रमा - ज्ञान] (अवसे) - रक्षण के लिए (हवम्) - पुकार को( गन्ताराः) - जानेवाले होते हैं , अर्थात् ज्ञानी व अपनी न्यूनताओं को दूर करने के लिए यत्नशील पुरुष का रक्षण इन्द्र और वरुण ही करते हैं । ऐसा पुरुष जब इन्हें पुकारता है तब ये सदा उपस्थित होते हैं । जितेन्द्रियता इसके दोषों व न्यूनताओं को दूर करके इसका पूरण करेगी तथा व्रतों का बन्धन - ब्रह्मचर्यादि व्रतों का धारण इसे ज्ञान - परिपूर्ण करेगा । इस प्रकार इन्द्र इसे 'विप्र' बनाएगा तो वरुण 'मा - वान्' ।  २. ये इन्द्र और वरुण (चर्षणीनाम्) - [कर्षणीनाम्] श्रमशील शक्तियों के धारा - धारण करनेवाले होते हैं । जितेन्द्रियता व व्रती बनना श्रमशीलता के बिना नहीं हो सकता । आलस्य में लेटनेवाला व्यक्ति न तो जितेन्द्रिय ही बन सकता है [इन्द्र] , न व्रतों के बन्धन में अपने को बाँधनेवाला [वरुण] । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इन्द्र और वरुण की कृपा - पात्रता के लिए हम विप्र , मावान् व चर्षणि बनें । अपना विशेषरूप से पूरण करें , ज्ञानवान् बनें , श्रमशील हों । 
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथेन्द्रवरुणाभ्यां सह सम्प्रयुक्ता अग्निजलगुणा उपदिश्यन्ते।

अन्वय:

ये हि खल्विमे अग्निजले सम्प्रयुक्ते मावतो विप्रस्य हवं गन्तारौ स्थः स्तश्चर्षणीनां धर्त्तारा धारणशीले चात अहमेतौ स्वस्य सर्वेषां चावसे आवृणे॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (गन्तारा) गच्छत इति गमनशीलौ। अत्र सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः। (हि) यतः (स्थः) स्तः। अत्र व्यत्ययः। (अवसे) क्रियासिद्ध्येषणायै (हवम्) जुहोति ददात्याददाति यस्मिन् तं होमशिल्पव्यवहारम् (विप्रस्य) मेधाविनः (मावतः) मद्विधस्य पण्डितस्य। अत्र वतुप्प्रकरणे युष्मदस्मद्भ्यां छन्दसि सादृश्य उपसंख्यानम्। (अष्टा०५.२.३९) अनेन वार्तिकेनास्मच्छब्दात्सादृश्ये वतुप् प्रत्ययः। आ सर्वनाम्नः। (अष्टा०६.३.९१) इत्याकारादेशश्च। (धर्त्तारा) कलाकौशलयन्त्रेषु योजितौ होमरक्षणशिल्प-व्यवहारान् धरतस्तौ (चर्षणीनाम्) मनुष्यादिप्राणिनाम्। कृषेरादेश्च च। (उणा०२.१०४) अनेन ‘कृष’धातोरनिः प्रत्यय आदेश्चकारादेशश्च॥२॥
भावार्थभाषाः - पूर्वस्मान्मन्त्रात् ‘आवृणे’ इति क्रियापदस्यानुवर्त्तनम्। विद्वद्भिर्यदा कलायन्त्रेषु युक्त्या संयोजिते अग्निजले प्रेर्य्येते तदा यानानां शीघ्रगमनकारके तत्र स्थितानां मनुष्यादिप्राणिनां पदार्थभाराणां च धारणहेतू सुखदायके च भवत इति॥२॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I pray to Indra and Varuna, lords of fire and water, both sustainers of mankind, to listen to the prayer of devotees like me, come to our yajnic projects of life and abide by us for our protection and progress.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Now the properties of the fire and water are taught in the 2nd Mantra.

अन्वय:

These fire and water when used properly help a wise man like me to accomplish the non-violent sacrifice and artistic activities, They are guardians of mankind when yoked in sacrifice and machines. Therefore I utilize them for the accomplishment of various activities.

पदार्थान्वयभाषाः - (अवसे) क्रियासिद्धयेषणायै = Desiring the accomplishment of the work-Tr. (धर्तारा) कला कौशलयन्त्रेषु योजितौ होमरक्षणशिल्पव्यवहारान् धरतस्तौ (चर्षणीनाम्) मनुष्यादिप्राणिनाम् । = of men and other living beings. (विप्रस्य) मेधाविनः = of a wise man.
भावार्थभाषाः - When men use the fire and water in machines, in a methodical proper manner, they become the means of the speedy motion of the conveyances (like the Railways) and by carrying men and articles, become the sources of happiness to all.
टिप्पणी: In his commentasy on this Mantra, Rishi Dayananda has taken इन्द्रावरुणौ in the sense of fire and water for which the following authorities may be cited. अथ यवैतत् प्रदीप्तो भवति उच्चैर्धूमः परमया जूत्या बल्बलीति तर्हि एष एवाग्निर्भवतीन्द्रः ।। (शत० २, ३.२.११ ) Here bright well-kindled fire has been called Indra. In Tairiya Brahmana 1.6.5.6 वरुण has been associated with the water. अप्सु वै वरुणः (तैत्ति० १.६.५.६ ) (विप्रस्य) विम इति मेधाविनाम (निघ० ३.१५) = Of a wise man. There is clear reference to the Vehicles like the modern Railways or Steam Engines which with the proper use of fire water and with the force of steam, carry men and goods put therein to distant places.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - पूर्वमंत्राने या मंत्रात ‘आवृणे’ या पदाचे ग्रहण केलेले आहे. विद्वान जेव्हा कलायंत्रात अग्नी व जल यांच्या बलाद्वारे तत्काळ याने चालवितात तेव्हा ते त्यात बसलेल्या माणसांना व पदार्थांना धारण करवून सुखदायक ठरतात. ॥ २ ॥