गन्ता॑रा॒ हि स्थोऽव॑से॒ हवं॒ विप्र॑स्य॒ माव॑तः। ध॒र्तारा॑ चर्षणी॒नाम्॥
gantārā hi stho vase havaṁ viprasya māvataḥ | dhartārā carṣaṇīnām ||
गन्ता॑राः। हि। स्थः। अव॑से। हव॑म्। विप्र॑स्य। माव॑तः। ध॒र्तारा॑ च॒र्ष॒णी॒नाम्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब इन्द्र और वरुण से संयुक्त किये हुए अग्नि और जल के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विप्र - मावान् - चर्षणि
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथेन्द्रवरुणाभ्यां सह सम्प्रयुक्ता अग्निजलगुणा उपदिश्यन्ते।
ये हि खल्विमे अग्निजले सम्प्रयुक्ते मावतो विप्रस्य हवं गन्तारौ स्थः स्तश्चर्षणीनां धर्त्तारा धारणशीले चात अहमेतौ स्वस्य सर्वेषां चावसे आवृणे॥२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Now the properties of the fire and water are taught in the 2nd Mantra.
These fire and water when used properly help a wise man like me to accomplish the non-violent sacrifice and artistic activities, They are guardians of mankind when yoked in sacrifice and machines. Therefore I utilize them for the accomplishment of various activities.
