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अत्रा॑ ते रू॒पमु॑त्त॒मम॑पश्यं॒ जिगी॑षमाणमि॒ष आ प॒दे गोः। य॒दा ते॒ मर्तो॒ अनु॒ भोग॒मान॒ळादिद्ग्रसि॑ष्ठ॒ ओष॑धीरजीगः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

atrā te rūpam uttamam apaśyaṁ jigīṣamāṇam iṣa ā pade goḥ | yadā te marto anu bhogam ānaḻ ād id grasiṣṭha oṣadhīr ajīgaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अत्र॑। ते॒। रू॒पम्। उ॒त्ऽत॒मम्। अ॒प॒श्य॒म्। जिगी॑षमाणम्। इ॒षः। आ। प॒दे। गोः। य॒दा। ते॒। मर्तः॑। अनु॑। भोग॑म्। आन॑ट्। आत्। इत्। ग्रसि॑ष्ठः। ओष॑धीः। अ॒जी॒ग॒रिति॑ ॥ १.१६३.७

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:163» मन्त्र:7 | अष्टक:2» अध्याय:3» वर्ग:12» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:22» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् ! (यदा) जब (ग्रसिष्ठः) अतीव खानेवाला (मर्त्तः) मनुष्य (अनु, भोगम्) अनुकूल भोग को (आनट्) प्राप्त होता है तब (आत्, इत्) उसी समय (ओषधीः) यवादि ओषधियों को (अजीगः) निरन्तर प्राप्त हो, जैसे (अत्र) इस विद्या और योगाभ्यास व्यवहार में मैं (ते) तुम्हारे (जिगीषमाणम्) जीतने की इच्छा करनेवाले (उत्तमम्) उत्तम (रूपम्) रूप को (आ, अपश्यम्) अच्छे प्रकार देखूँ और (गोः) पृथिवी के (पदे) पाने योग्य स्थान में (ते) आपके (इषः) अन्नादिकों को प्राप्त होऊँ वैसे आप भी ऐसा विधान कर इस उक्त व्यवहारादि को प्राप्त होओ ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - उद्योगी पुरुष ही को अच्छे-अच्छे पदार्थ भोग प्राप्त होते हैं किन्तु आलस्य करनेवाले को नहीं। जो यत्न के साथ पदार्थविद्या का ग्रहण करते हैं, वे अति उत्तम प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं ॥ ७ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु-दर्शन

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्रानुसार सात्त्विक मार्ग से चलनेवाला व्यक्ति कहता है कि - (अत्र) = यहाँ, इस सात्त्विक मार्ग में ते आपके (उत्तमं रूपम्) = पुरुषोत्तमरूप को- सात्त्विक आनन्दरूप को (आ अपश्यम्) = समन्तात् देखता हूँ । (जिगीषमाणम्) = आपका यह रूप मेरी सब वासनाओं को जीतने की कामना करता है। आपके रूप को देखने पर मेरी सब वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। आपके इस रूप को देखने पर (गो: पदे) = वेदवाणी के शब्दों में मैं (इषः आ) = [अपश्यम्] अपने जीवन के लिए प्राप्त होनेवाली प्रेरणाओं को देखता हूँ। २. इन प्रेरणाओं के अनुसार चलनेवाला (ते मर्तः) = तेरा व्यक्ति– तेरा उपासक (यदा) = जब (अनु) = यज्ञ करने के पश्चात् यज्ञशेष के रूप में (भोगम् आनट्) = भोगों को प्राप्त करता है (आत् इत्) = तो यह (ग्रसिष्ठः) = सर्वोत्तम भोजन करनेवाला होता है। बिना यज्ञ किये, स्वयं सब खा जानेवाला तो 'केवलाघो भवति केवलादी'– शुद्ध पाप को ही खाता है। यज्ञशेष का भोक्ता अमृत का सेवन करता है। यज्ञशेष ही अमृत है । ३. यह तेरा उपासक (ओषधीः अजीगः) = ओषधियों का ही सेवन करता है, वानस्पतिक भोजन ही इसे प्रिय होते हैं। प्रभु-भक्त कभी भी मांसाहार की ओर नहीं झुक सकता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ – सात्त्विक मार्ग पर चलनेवाला प्रभु के सर्वोत्तम रूप का दर्शन करता है। यह वेदवाणी की प्रेरणा के अनुसार यज्ञशेष का सेवन करता हुआ मांस-भोजन से सदा दूर रहता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे विद्वन् यदा ग्रसिष्ठो मर्त्तोऽनुभोगमानट् तदादिदोषधीरजीगः। यथाऽत्राऽहं ते जिगीषमाणमुत्तमं रूपमापश्यं गोः पदे तं इषः प्राप्नुयाम् तथा त्वमप्येवं विधायैतत्प्राप्नुहि ॥ ७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अत्र) अस्मिन् विद्यायोगाभ्यासव्यवहारे। अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (ते) तव (रूपम्) स्वरूपम् (उत्तमम्) उत्कृष्टम् (अपश्यम्) पश्येयम् (जिगीषमाणम्) जेतुमिच्छन्तम् (इषः) अन्नानि (आ) (पदे) प्राप्तव्ये (गोः) पृथिव्याः (यदा) यस्मिन् काले (ते) तव (मर्त्तः) मनुष्यः (अनु) (भोगम्) (आनट्) प्राप्नोति। अत्र नक्षतेर्गतिकर्मणो लङि छन्दस्यपि दृश्यत इत्याडागमः। नक्षतीति गतिकर्मा। निघं० २। १४। (आत्) अनन्तरम् (इत्) एव (ग्रसिष्ठः) अतिशयेन ग्रसिता (ओषधीः) यवादीन् (अजीगः)। भृशं प्राप्नुयात् ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - उद्योगिनमेव भोगा उपलभन्ते नालसं ये प्रयत्नेन पदार्थविद्यां गृह्णन्ति तेऽत्युत्तमां प्रतिष्ठां लभन्ते ॥ ७ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, O vital fire and creativity of life, I have seen that higher form, spirit and character of yours which is eager to conquer, consume and create the food and energy on the floor of the earth since, when the mortal humanity blest with food and enjoyment, and as a result of your holy ambition, eats their fill, then, O consumer and creator, you beget the herbs and juices for rectification of the human faults and weaknesses.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The scholars are addressed here.

अन्वय:

O learned person ! when a man with good appetite and normal digestive power receives delicious edibles, like the barley and other grains you swallow them. O wise person ! I behold your beautiful form in this dealing of the acquisition of knowledge and practice of Yoga, eager to get victory over internal and external foes and to enjoy the food produced here from the earth. Likewise, you should also do.

भावार्थभाषाः - Only industrious persons receive proper enjoyment and not lazy men. Those who acquire scientific knowledge with labor, are honored everywhere.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - उद्योगी पुरुषाला चांगल्या चांगल्या पदार्थांचे भोग प्राप्त होतात, परंतु आळशी माणसाला नाही. जे प्रयत्नपूर्वक पदार्थविद्येचे ग्रहण करतात त्यांना अत्यंत प्रतिष्ठा लाभते. ॥ ७ ॥