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इ॒मा ते॑ वाजिन्नव॒मार्ज॑नानी॒मा श॒फानां॑ सनि॒तुर्नि॒धाना॑। अत्रा॑ ते भ॒द्रा र॑श॒ना अ॑पश्यमृ॒तस्य॒ या अ॑भि॒रक्ष॑न्ति गो॒पाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imā te vājinn avamārjanānīmā śaphānāṁ sanitur nidhānā | atrā te bhadrā raśanā apaśyam ṛtasya yā abhirakṣanti gopāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒मा। ते॒। वा॒जि॒न्। अ॒व॒ऽमार्ज॑नानि। इ॒मा। श॒फाना॑म्। स॒नि॒तुः। नि॒ऽधाना॑। अत्र॑। ते॒। भ॒द्राः। र॒श॒नाः। अ॒प॒श्य॒म्। ऋ॒तस्य॑। याः। अ॒भि॒ऽरक्ष॑न्ति। गो॒पाः ॥ १.१६३.५

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:163» मन्त्र:5 | अष्टक:2» अध्याय:3» वर्ग:11» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:22» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (वाजिन्) विज्ञानवान् सज्जन ! जो (इमा) ये (ते) आपके (शफानाम्) कल्याण को देनेवाले व्यवहारों के (अवमार्जनानि) शोधन वा जो (इमा) ये (सनितुः) अच्छे प्रकार विभाग करते हुए आपके (निधाना) पदार्थों का स्थापन करते हैं और (याः) जो (ते) आपके (ऋतस्य) सत्य कारण के (भद्राः) सेवन करने और (रशनाः) स्वाद लेने योग्य पदार्थों को (गोपाः) रक्षा करनेवाले (अभिरक्षन्ति) सब ओर से पालते हैं उन सब पदार्थों को (अत्र) यहाँ मैं (अपश्यम्) देखूँ ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य अनुक्रम अर्थात् एक के पीछे एक, एक के पीछे एक ऐसे क्रम से समस्त पदार्थों के कारण और संयोग को जानते हैं, वे पदार्थवेत्ता होते हैं ॥ ५ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वर:व्रतों द्वारा पवित्रता व शान्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में वर्णित व्रतबन्धनों द्वारा शक्तिशाली बननेवाले जीव ! (इमा) = ये व्रत ही तेरे (अवमार्जनानि) = जीवन को परिमार्जित करनेवाले हैं। व्रतों से जीवन पवित्र बनता है । (इमा) = ये व्रत ही (सनितुः) = संविभागपूर्वक खानेवाले (ते) = तुझमें (शफानाम्) = शान्तियों के (निधाना) = स्थापित करनेवाले होते हैं। व्रती जीवनवाला व्यक्ति लोभ से ऊपर उठ जाने के कारण सदा सबके साथ बाँटकर खाता है, परिणामतः लड़ाई-झगड़े होते ही नहीं और जीवन शान्त बना रहता है। २. (अत्र) = यहाँ, इन व्रतों में ही (ते) = तेरी (भद्राः) = कल्याणकर (रशनाः) = मेखलाओं– कटिबन्धनों को आ (अपश्यम्) = देखता हूँ, अर्थात् तू इन पुण्यव्रतों का दृढ़ता से पालन करता है। (याः) = ये कटिबन्धन- दृढ़ निश्चय (ऋतस्य) = तेरे सत्यव्रतों का (अभिरक्षन्ति) = रक्षण करते हैं और (गोपा:) = तेरी इन्द्रियों का रक्षण करनेवाले होते हैं। व्रत इन्द्रियों को विषयों में फँसने से बचाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ – व्रतों में ही जीवन की पवित्रता है, शान्ति है । इन व्रतों का दृढ़ निश्चय से पालन करने पर इन्द्रियाँ सुरक्षित रहती हैं और विषय पङ्क में फँसने से बच जाती हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे वाजिन् यानीमा ते शफानामवमार्जनानि यानिमा सनितुर्निधाना सन्ति यास्त ऋतस्य भद्रा रशना गोपा अभिरक्षन्ति च तान् पूर्वोक्तानत्राऽहमपश्यम् ॥ ५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इमा) इमानि (ते) तव (वाजिन्) विज्ञानवन् (अवमार्जनानि) शोधनानि (इमा) इमानि (शफानाम्) शं फणन्ति तेषाम्। अत्राऽन्येभ्योऽपि दृश्यत इति डः। (सनितुः) संविभाजकस्य (निधाना) निधानानि (अत्र) अत्र। ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (ते) तस्य (भद्राः) भजनीयाः (रशनाः) आस्वादनीयाः (अपश्यम्) पश्येयम् (ऋतस्य) सत्यस्य कारणस्य (याः) (अभिरक्षन्ति) सर्वतः पालयन्ति (गोपाः) रक्षकाः ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - येऽनुक्रमात् सर्वेषां पदार्थानां कारणं संयोगं च जानन्ति ते पदार्थवेत्तारो भवन्ति ॥ ५ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Vajin, tempestuous power-input of the yajna of existence, these are the stages of your refinement, contentive concentrations of the applicable values of energy which are positive gifts of wealth and well-being for humanity. I wish and pray I may see those positive lines of natural and scientific developments of yours which observe, preserve and advance the process of life’s yajnic evolution.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of men of wisdom given.

अन्वय:

O learned Commander of the army ! I look after the bath arrangements of these your horses and their stables for the protection of their horses. Moreover, in this army, I see the auspicious reins of your horses. They save us from misfortunes and direct the right passage. So you should also see them.

भावार्थभाषाः - Those who know the origin and proper use of all objects, become well-versed in science.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे अनुक्रमाने अर्थात् एका पाठोपाठ एक अशा क्रमाने संपूर्ण पदार्थांचे कारण व संयोग जाणतात ते पदार्थवेत्ते असतात. ॥ ५ ॥