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सेमं नः॒ स्तोम॒मा ग॒ह्युपे॒दं सव॑नं सु॒तम्। गौ॒रो न तृ॑षि॒तः पि॑ब॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

semaṁ naḥ stomam ā gahy upedaṁ savanaṁ sutam | gauro na tṛṣitaḥ piba ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। इ॒मम्। नः॒। स्तोम॑म्। आ। ग॒हि॒। उप॑। इ॒दम्। सव॑नम्। सु॒तम्। गौ॒रः। न। तृ॒षि॒तः। पि॒ब॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:16» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:30» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:4» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी अगले मन्त्र में इन्द्र के गुणों का उपदेश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - जो उक्त सूर्य्य (नः) हमारे (इमम्) अनुष्ठान किये हुए (स्तोमम्) प्रशंसनीय यज्ञ वा (सवनम्) ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले क्रियाकाण्ड को (न) जैसे (तृषितः) प्यासा (गौरः) गौरगुणविशिष्ट हरिन (उपागहि) समीप प्राप्त होता है, वैसे (सः) वह (इदम्) इस (सुतम्) उत्पन्न किये ओषधि आदि रस को (पिब) पीता है॥५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अत्यन्त प्यासे मृग आदि पशु और पक्षी वेग से दौड़कर नदी तालाब आदि स्थान को प्राप्त होके जल को पीते हैं, वैसे ही यह सूर्य्यलोक अपनी वेगवती किरणों से ओषधि आदि को प्राप्त होकर उसके रस को पीता है। सो यह विद्या की वृद्धि के लिये मनुष्यों को यथावत् उपयुक्त करना चाहिये॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आदेशत्रयी

पदार्थान्वयभाषाः - १. प्रभु जीव को प्रस्तुत मन्त्र में तीन आदेश देते हैं - (सः) - वह तू (नः) - हमारे (इमम् स्तोमम्) - इस स्तोम - स्तुतिसमूह को (आगहि) - ग्रहण करनेवाला बन , अर्थात् 'सर्वज्ञता , न्यायकारिता , दयालुत्व' आदि जिन गुणों से तू मेरा स्तवन करता है , उन गुणों को तू अपने जीवन में ग्रहण करनेवाला हो । जब तू स्वयं अधिक - से - अधिक ज्ञानी बनने का प्रयत्न करेगा , न्यायशील होगा व दयालु स्वभाववाला बनेगा , तभी तू मेरा सच्चा स्तवन कर रहा होगा । यह तुझसे की जानेवाली मेरी 'दृश्य भक्ति' होगी । इस 'दृशीक - स्तोम' का ही महत्त्व है । केवल 'श्रव्यभक्ति' जो तेरे जीवन का अङ्ग नहीं बनती , वह तो व्यर्थ ही है ।  २. प्रभु का दूसरा आदेश यह है कि तू (इदम् सवनम्) - इस यज्ञ के उप - सदा समीप रहनेवाला हो । तेरा जीवन यज्ञों से व्याप्त हुआ - हुआ हो । तेरे जीवन के सौ - के - सौ वर्ष यज्ञमय होकर तेरे 'शतक्रतु' नाम को चरितार्थ करें ।  ३. (तृषितः गौरः नः) - प्यासे मृग की तरह तू (सुतम् पिब) - इस उत्पन्न सोम का पान करनेवाला बन । प्यासे मृग को पानी पीने की तीन अभिलाषा होती है , उसी प्रकार तुझमें इस सोम के पान की उत्कट आकांक्षा हो । तुझे सोमपान के बिना शान्ति ही न मिले , तेरे लिए यह सोमपान ही रुचिकर हो । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - [क] हम प्रभु के गुणों को धारण करें ,  [ख] जीवन को यज्ञमय बनाएँ ,  [ग] सोम के रक्षण के लिए उग्र प्रयत्नवाले हों । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरिन्द्रगुणा उपदिश्यन्ते।

अन्वय:

य इन्द्रो नोऽस्माकमिमं स्तोमं सवनं तृषितो गौरो मृगो न इवोपागह्युपागच्छति, स इदं स्तुतमुत्पन्नमोषध्यादिरसं पिब पिबति॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) इन्द्रः (इमम्) अनुष्ठीयमानम् (नः) अस्माकम् (स्तोमम्) स्तूयते गुणसमूहो यस्तं यज्ञम् (आ) समन्तात् (गहि) गच्छति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् बहुलं छन्दसि इति शपो लुक् च। (उप) सामीप्ये (इदम्) प्रत्यक्षम् (सवनम्) सुवन्त्यैश्वर्य्यं प्राप्नुवन्ति येन तत् क्रियाकाण्डम् (सुतम्) ओषध्यादिरसम् (गौरः) गौरगुणविशिष्टो मृगः (न) जलाशयं प्राप्य जलं पिबतीव (तृषितः) यस्तृष्यति पिपासति सः (पिब) पिबति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च॥५॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथाऽत्यन्तं तृषिता मृगादयः पशुपक्षिणो वेगेन धावनं कृत्वोदकाशयं प्राप्य जलं पिबन्ति तथैवैष इन्द्रो वेगवद्भिः किरणैरोषध्यादिकं प्राप्यैतेषां रसं पिबति, मनुष्यैः सोऽयं विद्यावृद्धये यथावदुपयोक्तव्यः॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May Indra, rays of the sun and currents of energy, come to this celebration and yajna of ours and drink of the sweets of this creative programme of ours as a thirsty golden stag drinks of the water of a stream.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of Indra are told in he fifth Mantra.

अन्वय:

This Indra (Sun) comes with his rays to our Yajna (nonviolent sacrifice) where hymns of praise to God are uttered and to our practical workshops etc., where wealth is acquired like a thirsty stag to a tank. He drinks the sap of the herbs, plants etc.

पदार्थान्वयभाषाः - (सवनम् ) सुवन्ति ऐश्वर्य प्राप्नुवन्ति येन तत् क्रियाकाण्डम् || (गौर:) गौरगुणविशिष्टो मृगः ॥
भावार्थभाषाः - There is Upamalankar or simile used in this Mantra. As thirsty stags and other beasts and birds come running to a tank or river and drink water there, so this sun with his rays drinks the sap of these herbs and plants etc. Men should utilize the sun or his rays for the accomplishment of knowledge and various purposes.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has used व्यत्यय: (change of case and person etc.) just to avoid misunderstanding, otherwise there was not much need to do so for intelligent persons. In` almost 90 percent cases, the Vyatyaya (change of case and person etc.) mentioned by him in his commentary, to which much exception is taken by some critics is of the same kind. For instance, he could translate this Mantra even in the case of the sun as— हे इन्द्र (सूर्य) अस्माकम् इमं स्तोमं सवनं तृषितो गौरः मृगः इव उपागहि इदं सुतम् उत्पन्नमोषधिरसं पिब ।। As according to the general rule given in the Nirukta Daivata Kanda अचेतनान्यपि चेतनवत् स्तूयन्ते ॥ i. e. even inanimate objects are praised of addressed like animate objects as poets very often do. But he has preferred to resort to Vyatyaya (or change of case, person etc. according to व्यत्ययो बहुलम्, so that there may not be any misunderstanding in the minds of less intelligent persons that the sun is considered. as a living being. This point should be clearly understood by all scholars. We have already quoted authorities from the Brahmanas and other ancient literature to show that by Indra, the sun is meant in many Mantras.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे अत्यंत तहानेने व्याकुळ झालेले हरिण इत्यादी पशू-पक्षी वेगाने पळतात व नदी किंवा तलावाजवळ जाऊन पाणी पितात, तसेच हा सूर्यलोक आपल्या गतिमान किरणांनी औषधी वगैरे प्राप्त क्रून त्याचा रस पितो. त्यामुळे ही विद्या वाढविण्यासाठी माणसांनी त्याचा उपयोग करून घेतला पाहिजे. ॥ ५ ॥