इ॒मा धा॒ना घृ॑त॒स्नुवो॒ हरी॑ इ॒होप॑वक्षतः। इन्द्रं॑ सु॒खत॑मे॒ रथे॑॥
imā dhānā ghṛtasnuvo harī ihopa vakṣataḥ | indraṁ sukhatame rathe ||
इ॒माः। धा॒नाः। घृ॒त॒ऽस्नुवः॑। हरी॒ इति॑। इ॒ह। उप॑। व॒क्ष॒तः॒। इन्द्र॑म्। सु॒खऽत॑मे। रथे॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी अगले मन्त्र में सूर्य्यलोक के गुणों का ही उपदेश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
धाना घृत
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तद्गुणा उपदिश्यन्ते।
हरी कृष्णशुक्लपक्षाविहेमा घृतस्नुवो धाना इन्द्रं सुखतमे रथ उपवक्षत उपगतं वहतः प्रापयतः॥१२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
It is the bright and dark for night in this world that bring to us the sun and its bright and water-producing rays in a a chariot (so to speak) that gives pleasure.
