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मरु॑तः॒ पिब॑त ऋ॒तुना॑ पो॒त्राद्य॒ज्ञं पु॑नीतन। यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानवः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

marutaḥ pibata ṛtunā potrād yajñam punītana | yūyaṁ hi ṣṭhā sudānavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मरु॑तः। पिब॑त। ऋ॒तुना॑। पो॒त्रात्। य॒ज्ञम्। पु॒नी॒त॒न॒। यू॒यम्। हि। स्थ। सु॒ऽदा॒न॒वः॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:15» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:4» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब ऋतुओं के साथ पवन आदि पदार्थ सब को खींचते और पवित्र करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - ये (मरुतः) पवन (ऋतुना) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ सब रसों को (पिबत) पीते हैं, वे ही (पोत्रात्) अपने पवित्रकारक गुण से (यज्ञम्) उक्त तीन प्रकार के यज्ञ को (पुनीतन) पवित्र करते हैं, तथा (हि) जिस कारण (यूयम्) वे (सुदानवः) पदार्थों के अच्छी प्रकार दिलानेवाले (स्थ) हैं, इससे वे युक्ति के साथ क्रियाओं में युक्त हुए कार्य्यों को सिद्ध करते हैं॥२॥
भावार्थभाषाः - ऋतुओं के अनुक्रम से पवनों में भी यथायोग्य गुण उत्पन्न होते हैं, इसीसे वे त्रसरेणु आदि पदार्थों वा क्रियाओं के हेतु होते हैं तथा अग्नि के बीच में सुगन्धित पदार्थों के होमद्वारा वे पवित्र होकर प्राणीमात्र को सुखसंयुक्त करते हैं और वे ही पदार्थों के देने-लेने में हेतु होते हैं॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मरुतों का सोमपान

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में (ऋतुना) - समय रहते सोमपान का उल्लेख था । वह प्रस्तुत मन्त्र में भी है । इसका अभिप्राय यह है कि सोम का उत्पादन जिस अवस्था में अत्यधिक होता है , उस यौवन में ही इसकी रक्षा की भी अत्यन्त आवश्यकता होती है । जीवन के चरमकाल में तो वैसे ही कुछ शान्ति हो जाती है , अतः हमें सोपान का विचार 'प्रातः व माध्यन्दिनसवन' बाल्य [प्रथमावस्था] व यौवन में पूर्णरूप से करना चाहिए 'प्रथमे वयसि यः शान्तः स शान्त इत्युच्यते । धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते' ॥ प्रथम अवस्था में जो शान्त हुआ , शान्त तो वही हुआ , धातुओं के क्षीण होने पर तो शान्ति किसे नहीं हो जाती? अतः कहते हैं कि (मरुतः) - हे प्राणो! (ऋतुना) - समय रहते (सोमम्) - सोम को (पिबत) - पीने का ध्यान करो । उत्पन्न सोमकणों को शरीर में ही सुरक्षित रखने के लिए प्राणसाधना अत्यन्त उपयोगी है । प्राणसाधना के द्वारा ये वीर्यकण ऊर्ध्वगतिवाले होकर शरीर में ही व्याप्त हो जाते हैं , यही मरुतों का सोमपान है ।  २. हे मरुतो ! यह सोम शरीर को नीरोग और मन को निर्मल बनाकर जीवन को पवित्र करनेवाला है । इस (पोत्रात्) - पवित्र करनेवाले सोम से (यज्ञम्) - हमारे जीवन - यज्ञ को (पुनीतन) - तुम पवित्र कर दो । प्राणसाधना से सोम शरीर में व्याप्त होगा और जीवन को पवित्र कर देगा ।  ३. इस प्रकार हे मरुतो ! (यूयम्) - तुम (हि) - निश्चय से (सुदानवः) - [स्थ] उत्तमता से बुराइयों के काटनेवाले [दाप् लवणे] हो ।  ४. पिछले मन्त्र में 'इन्द्र' शब्द के द्वारा जितेन्द्रियता का संकेत किया गया था , प्रस्तुत मन्त्र में 'मरुतः' से प्राणसाधना का निर्देश है । सोम के शरीर में ही व्यापन के लिए जितेन्द्रियता व प्राणसाधना दोनों ही आवश्यक हैं । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणायाम द्वारा हम सोम को शरीर में ही व्याप्त करें । यह सुरक्षित सोम हमारे जीवनों को पवित्र करेगा । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ ऋतुभिः सह मरुतः पदार्थानाकर्षन्ति पुनन्ति चेत्युपदिश्यते।

अन्वय:

इमे मरुत ऋतुना सर्वान् पिबत पिबन्ति, त एव पोत्राद्यज्ञं पुनीतन पुनन्ति हि यतो यूयमेते सुदानवः स्थ सन्ति तस्माद्युक्त्या योजिता कार्य्यसाधका भवन्तीति॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (मरुतः) वायवः। मृग्रोरुतिः। (उणा०१.९४) इति ‘मृङ्’धातोरुतिः प्रत्ययः। मरुत इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.५) अनेन गमनागमनक्रियाप्रापका वायवो गृह्यन्ते। (पिबत) पिबन्ति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च। (ऋतुना) ऋतुभिः सह (पोत्रात्) पुनाति येन गुणेन तस्मात्। अत्र सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। (उणा०४.१५९) इति पूञ्धातोः ष्ट्रन् प्रत्ययः स्वरव्यत्ययश्च। (यज्ञम्) त्रिविधं पूर्वोक्तम् (पुनीतन) पुनन्ति पवित्रीकुर्वन्ति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् तकारस्य तनबादेशश्च। (यूयम्) एते (हि) यतः (स्थ) सन्ति। अत्र पुरुषव्यत्ययो लडर्थे लोट्, अन्येषामपि दृश्यते इति दीर्घश्च। (सुदानवः) सुष्ठु दानहेतवः। दाभाभ्यां नुः। (उणा०३.३१) इति सूत्रेण नुः प्रत्ययः॥२॥
भावार्थभाषाः - ऋतुपर्य्यायेण वायुष्वपि गुणा यथाक्रममुत्पद्यन्ते तद्विशिष्टाः सर्वेषां त्रसरेण्वादीनां चेष्टानां च हेतवः सन्त्यग्नौ सुगन्ध्यादिहोमद्वारा पवित्रीभूत्वा सर्वान् सुखयुक्तान् कृत्वा त एव दानादानहेतवो भवन्ति॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Maruts, pure and purifying powers of the winds, drink the sap of nature according to the seasons, purify the yajna of nature according to the seasons by your powers of purity. Stay you all in your element, noble generous givers.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Now the airs draw the articles with seasons and purify them is taught in the 2nd verse.

अन्वय:

These airs take all the sap of juice of the herbs and the plants etc. They by their purifying properties, purify the Yajna, because they are givers of happiness and health. When utilized properly, they accomplish various acts.

पदार्थान्वयभाषाः - (मरुतः) वायवः मृग्नोरुति: (उणा० १९४ ) इति मृड़धातोः उतिः प्रत्ययः मरुत इति पदनामसु पठितम् (निघ० ५.५ ) अनेन गमनागमनक्रिया वायवो गृह्यन्ते (सुदानव:) सुष्ठु दानहेतवः दाभाभ्यां नुः (उणा० ३.११) To make clear Rishi Dayananda has taken many verbs in changed form. Had he not done so, ordinary men would have been misled: Hence the necessity of changing forms and gender etc. This should always be borne in mind.
भावार्थभाषाः - According to seasons, in airs are also attributes which are the causes of various movements of other particles. When fragrant oblations are put into the fire which are full of ghee etc. they purify them and make everyone happy.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ऋतूंच्या अनुक्रमाने वायूमध्येही यथायोग्य गुण उत्पन्न होतात. त्यामुळे ते त्रसरेणू इत्यादी पदार्थांचे किंवा क्रियेचे कारण असतात, तसेच अग्नीमध्ये सुगंधित पदार्थ टाकल्याने ते पवित्र बनून प्राणिमात्राला सुखी करतात व तेच पदार्थांच्या देण्याघेण्याचे कारण असतात. ॥ २ ॥