इन्द्र॒ सोमं॒ पिब॑ ऋ॒तुना त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑वः। म॒त्स॒रास॒स्तदोक॑सः॥
indra somam piba ṛtunā tvā viśantv indavaḥ | matsarāsas tadokasaḥ ||
इन्द्र॑। सोम॑म्। पिब॑। ऋ॒तुना॑। आ। त्वा॒। वि॒श॒न्तु॒। इन्द॑वः। म॒त्स॒रासः॒। तत्ऽओ॑कसः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पन्द्रहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में ऋतु-ऋतु में रस की उत्पत्ति और गति का वर्णन किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्द्र का सोमपान [मत्सरासः , तदोकसः]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्र प्रत्यृतुं रसोत्पत्तिर्गमनं च भवतीत्युपदिश्यते।
हे मनुष्य ! अयमिन्द्र ऋतुना सोमं पिब पिबति। इमे तदोकसो मत्सरास इन्दवो जलरसा ऋतुना सह त्वा त्वां तं वा प्रतिक्षणमाविशन्त्वाविशन्ति॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
In every season, there is the drawing of the sap of juice and a particular movement is taught in the first Mantra.
The sun which is the cause of the division of Time, drinks All these or draws the juice of the herbs in every season. cheering waters settle there among the rays of the sun according to the spring and other seasons.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)जे सर्व देवांचे अनुयोगी वसंत इत्यादी ऋतू आहेत, त्यांचे यथायोग्य गुण प्रतिपादन करून चौदाव्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर या पंधराव्या सूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणली पाहिजे.
