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पु॒रूणि॑ द॒स्मो नि रि॑णाति॒ जम्भै॒राद्रो॑चते॒ वन॒ आ वि॒भावा॑। आद॑स्य॒ वातो॒ अनु॑ वाति शो॒चिरस्तु॒र्न शर्या॑मस॒नामनु॒ द्यून् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

purūṇi dasmo ni riṇāti jambhair ād rocate vana ā vibhāvā | ād asya vāto anu vāti śocir astur na śaryām asanām anu dyūn ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒रूणि॑। द॒स्मः। नि। रि॒णा॒ति॒। जम्भैः॑। आत्। रो॒च॒ते॒। वने॑। आ। वि॒भाऽवा॑। आत्। अ॒स्य॒। वातः॑। अनु॑। वा॒ति॒। शो॒चिः। अस्तुः॑। न। शर्या॑म्। अ॒स॒नाम्। अनु॑। द्यून् ॥ १.१४८.४

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:148» मन्त्र:4 | अष्टक:2» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:21» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - जो (विभावा) विशेषता से दीप्ति करने तथा (दस्मः) दुःख का नाश करनेवाला अग्नि (जम्भैः) चलाने आदि अपने गुणों से (पुरूणि) बहुत वस्तुओं को (अनु, द्यून्) प्रति दिन (नि, रिणाति) निरन्तर पहुँचाता है, (आत्) इसके अनन्तर (वने) जङ्गल में (आ, रोचते) अच्छे प्रकार प्रकाशमान होता है (आत्) और (अस्य) इसका सम्बन्धी (वातः) पवन (अनु, वाति) इसके पीछे बहता है, जिसकी (शोचिः) दीप्ति प्रकाशमान (अस्तुः) प्रेरणा देनेवाले शिल्पी जन की (असनाम्) प्रेरणा के (न) समान (शर्याम्) पवन की ताड़ना को प्राप्त होता है, उससे उत्तम काम मनुष्यों को सिद्ध करने चाहियें ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्या से उत्पन्न की हुई ताड़नादि क्रियाओं से बिजुली की विद्या को सिद्ध करते हैं, वे प्रतिदिन उन्नति को प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ब्रह्मलक्ष्य-वेध

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार जब हम प्रभु-दर्शन में प्रवृत्त होते हैं तब (दस्मः) = हमारे पापों व दुःखों का उपक्षय करनेवाले प्रभु (जम्भैः) = अपनी नाशक शक्तिरूप दाढ़ों से पुरूणि बहुत भी हमारे शत्रुओं को (निरिणाति) = हिंसित कर देते हैं और (आत्) = अब- कामादि शत्रुओं का विध्वंस करने के बाद वे (विभावा) = विशिष्ट दीप्तिवाले प्रभु (वने) = अपने उपासक में [वन सम्भजने] (आरोचते) = समन्तात् प्रकाश देनेवाले होते हैं । २. (आत्) = अब- प्रभु का प्रकाश होने पर (अस्य शोचिः अनु) = इसकी दीप्ति के अनुसार (वातः वाति) = यह क्रियाशील पुरुष क्रियावाला होता है। वायु की भाँति क्रिया करना इस उपासक का स्वभाव हो जाता है। मुख्यरूप से इसकी क्रिया (अनु द्यून्) = प्रतिदिन इस प्रकार होती है (न) = जैसे कि (अस्तुः) = बाणों को फेंकनेवाले की (असनाम्) = फेंके जानेवाली (शर्याम्) = बाण-समूह की क्रिया होती है। जैसे धनुर्धर लक्ष्य पर बाणों को फेंकता है, उसी प्रकार यह भक्त भी प्रणव [ओम्] को धनुष बनाता है, आत्मा को शर तथा ब्रह्म को लक्ष्य बनाकर अप्रमत्त होकर लक्ष्यवेध करता है और तन्मय होने का प्रयत्न करता है। जैसे शर लक्ष्य में प्रविष्ट हो जाता है । उसी प्रकार आत्मा परमात्मा में प्रविष्ट हो जाता है- परमात्मा के गर्भ में निवास करने लगता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु भक्त के कष्टों को दूर करते हैं, उसे दीस बनाते हैं। प्रभुदीप्ति के अनुसार भक्त के कार्य होते हैं। यह भक्त आत्मा को शर बनाकर प्रभुरूप लक्ष्य में प्रवेश के लिए यत्नशील होता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

यो विभावा दस्मोऽग्निर्जम्भैः पुरूणि वस्तून्यनुद्यून् नि रिणाति आद्वने आ रोचते आदस्य वातोऽनुवाति यस्य शोचिरस्तुरसनां न शर्यां रिणाति तेनोत्तमानि कार्याणि मनुष्यैः साधनीयानि ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरूणि) बहूनि (दस्मः) दुःखोपक्षेता (नि) (रिणाति) प्राप्नोति (जम्भैः) चालनादिभिः स्वगुणैः (आत्) अनन्तरे (रोचते) (वने) जङ्गले (आ) समन्तात् (विभावा) यो विभाति सः (आत्) अनन्तरम् (अस्य) (वातः) वायुः (अनु) (वाति) गच्छति (शोचिः) दीप्तिः (अस्तुः) प्रक्षेप्तुः (न) इव (शर्याम्) वायुताडनाख्यां क्रियाम् (असनाम्) प्रक्षेपणाम् (अनु) (द्यून्) दिनानि ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। ये विद्योत्पादनताडनादिक्रियाभिस्तडिद्विद्यां साध्नुवन्ति ते प्रतिदिनमुन्नतिं लभन्ते ॥ ४ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, mighty power of light and fire, catalyses, destroys and creates many and, blazing in the light rays, shines in majesty. And then shining and blazing like a shooting star of the eternal archer, it releases stormy currents of energy every day, every minute, every moment.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The analysts and discoverers hold the show.

अन्वय:

The fire which is destroyer of many diseases (through Yajna etc.) and which is radiant, takes ingredients. to the farthest every day, because of its impelling power and other attributes. It shines with the intensified radiance in the forest and is termed as a form of Davagni. The favorable direction of the wind blows the flames onwards each day, like the swift arrows of an archer.

भावार्थभाषाः - The persons through scientific knowledge about the fire and power, accomplish many achievements and make much progress.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. विद्येपासून उत्पन्न झालेल्या ताडन इत्यादी क्रियांनी जे विद्युत विद्या सिद्ध करतात. त्यांची दिवसेंदिवस उन्नती होते. ॥ ४ ॥