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बोधा॑ मे अ॒स्य वच॑सो यविष्ठ॒ मंहि॑ष्ठस्य॒ प्रभृ॑तस्य स्वधावः। पीय॑ति त्वो॒ अनु॑ त्वो गृणाति व॒न्दारु॑स्ते त॒न्वं॑ वन्दे अग्ने ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bodhā me asya vacaso yaviṣṭha maṁhiṣṭhasya prabhṛtasya svadhāvaḥ | pīyati tvo anu tvo gṛṇāti vandārus te tanvaṁ vande agne ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बोध॑। मे॒। अ॒स्य। वच॑सः। य॒वि॒ष्ठ॒। मंहि॑ष्ठस्य। प्रऽभृ॑तस्य। स्व॒धा॒ऽवः॒। पीय॑ति। त्वः॒। अनु॑। त्वः॒। गृ॒णा॒ति॒। व॒न्दारुः॑। ते॒। त॒न्व॑म्। व॒न्दे॒। अ॒ग्ने॒ ॥ १.१४७.२

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:147» मन्त्र:2 | अष्टक:2» अध्याय:2» वर्ग:16» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:21» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (स्वधावः) प्रशंसित अन्नवाले (यविष्ठ) अत्यन्त तरुण ! तू (मे) मेरे (अस्य) इस (मंहिष्ठस्य) अतीव बुद्धियुक्त (प्रभृतस्य) उत्तमता से धारण किये हुए (वचसः) वचन को (बोध) जान। हे (अग्ने) विद्वानों में उत्तम विद्वान् ! जैसे (वन्दारुः) वन्दना करनेवाला मैं (ते) तेरे (तन्वम्) शरीर को (वन्दे) अभिवादन करता हूँ वा जैसे (त्वः) दूसरा कोई जन (पीयति) जल आदि को पीता है वा जैसे (त्वः) दूसरा कोई और जन (अनुगृणाति) अनुकूलता से स्तुति प्रशंसा करता है, वैसे मैं भी होऊँ ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - जब आचार्य के समीप शिष्य पढ़े तब पिछले पढ़े हुए की परीक्षा देवे, पढ़ने से पहिले आचार्य को नमस्कार उसकी वन्दना करे और जैसे अन्य धीर बुद्धिवाले पढ़ें, वैसे आप भी पढ़े ॥ २ ॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे स्वधावो यविष्ठ त्वं मेऽस्य मंहिष्ठस्य प्रभृतस्य वचसो बोध। हे अग्ने यथा वन्दारुरहं ते तन्वं वन्दे यथा त्वः पीयति यथा त्वोऽनुगृणाति तथाऽहमपि भवेयम् ॥ २ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (बोध) अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (मे) मम (अस्य) (वचसः) वचनस्य (यविष्ठ) अतिशयेन युवा (मंहिष्ठस्य) अतिशयेनोरोर्बहुप्रज्ञस्य (प्रभृतस्य) प्रकर्षेण धृतस्य (स्वधावः) प्रशस्तमन्नं विद्यते यस्य तत्सम्बुद्धौ (पीयति) पिबति (त्वः) अन्यः (अनु) आनुकूल्ये (त्वः) द्वितीयः (गृणाति) स्तौति (वन्दारुः) अभिवादनशीलः (ते) तव (तन्वम्) शरीरम् (वन्दे) अभिवादये (अग्ने) विद्वत्तम ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - यदाऽऽचार्यस्य समीपे शिष्योऽधीयेत तदा पूर्वस्याऽधीतस्य परीक्षां दद्यात्। अध्ययनात्प्रागाचार्यं नमस्कुर्याद्यथाऽन्ये मेधाविनो युक्त्याधीयेरन् तथा स्वयमपि पठेत् ॥ २ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light, master of your own power of knowledge, youngest of the lights, listen to me, I pray, and know my word, highest and most powerful of mine ever borne: One drinks at the fount of your knowledge, and the other repeats your words according as you have directed. I am your admirer and worshipper. I bow to your body, mind and soul.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

A request to the scholar submitted.

अन्वय:

O most energetic great scholar! you are capable to feed and accommodate your disciples. Tell me the secret meaning of this my word of adoration. It is full of wisdom. Uphold firmly my this meaningful reverential and earnest praise. I your devoted pupil bow before you in person. O great teacher! another one your disciple takes your juice of devotion. The third one, sings in your praise or glorifies you. Let me also be like those good pupils.

भावार्थभाषाः - When a pupil studies under an Acharya (Preceptor), he should get himself examined by him. Before commencing the study, he should bow down before his preceptor and make obeisance to him humbly. Like other intelligent students, he should also study industriously and methodically.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जेव्हा आचार्याजवळ शिष्य शिकतो तेव्हा पूर्वी शिकलेल्याची परीक्षा द्यावी. शिकण्यापूर्वी आचार्यांना नमस्कार करून वन्दना करावी व जसे इतर मेधावी शिकतात, तसे स्वतःही शिकावे. ॥ २ ॥