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तमिद्ग॑च्छन्ति जु॒ह्व१॒॑स्तमर्व॑ती॒र्विश्वा॒न्येक॑: शृणव॒द्वचां॑सि मे। पु॒रु॒प्रै॒षस्ततु॑रिर्यज्ञ॒साध॒नोऽच्छि॑द्रोति॒: शिशु॒राद॑त्त॒ सं रभ॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam id gacchanti juhvas tam arvatīr viśvāny ekaḥ śṛṇavad vacāṁsi me | purupraiṣas taturir yajñasādhano cchidrotiḥ śiśur ādatta saṁ rabhaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम्। इत्। ग॒च्छ॒न्ति॒। जु॒ह्वः॑। तम्। अर्व॑तीः। विश्वा॑नि। एकः॑। शृ॒ण॒व॒त्। वचां॑सि। मे॒। पु॒रु॒ऽप्रै॒षः। ततु॑रिः। य॒ज्ञ॒ऽसाध॑नः। अच्छि॑द्रऽऊतिः। शिशुः॑। आ। अ॒द॒त्त॒। सम्। रभः॑ ॥ १.१४५.३

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:145» मन्त्र:3 | अष्टक:2» अध्याय:2» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:21» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् ! आप (एकः) अकेले (मे) मेरे (विश्वानि) समस्त (वक्षांसि) वचनों को (शृणवत्) सुनें जो (रभः) बड़ा महात्मा (पुरुप्रैषः) जिसको बहुत सज्जनों ने प्रेरणा दी हो (ततुरिः) जो दुःख से सभों को तारनेवाला (यज्ञसाधनः) विद्वानों के सत्कार जिसके साधन अर्थात् जिसकी प्राप्ति करानेवाले (अच्छिद्रोतिः) जिससे नहीं खण्डित हुई रक्षणादि क्रिया (शिशुः) और जो अविद्यादि दोषों को छिन्न-भिन्न करे, सबके उपकार करने को अच्छा यत्न (समादत्त) भली-भाँति ग्रहण करे (तम्) उसको (अर्वतीः) बुद्धिमती कन्या (गच्छन्ति) प्राप्त होती (तमित्) और उसीको (जुह्वः) विद्या विज्ञान की ग्रहण करनेवाली कन्या प्राप्त होती हैं ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों ने जो जाना और जो-जो पढ़ा उस-उस की परीक्षा जैसे अपने आप पढ़ानेवाले विद्वान् को देवें वैसे कन्या भी अपनी पढ़ानेवाली को अपने पढ़े हुए की परीक्षा देवें ऐसे करने के विना सत्याऽसत्य का सम्यक् निर्णय होने को योग्य नहीं है ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'निर्देष्टा व तारयिता' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - १. [हूयन्ते इति जुह्वः - आहुतयः] (जुह्वः) = सब आहुतियाँ (तम् इत्) = उस प्रभु को ही गच्छन्ति प्राप्त होती हैं। (तम्) = उस प्रभु को ही (अर्वती:) = [अर्व = to kill] सब अशुभों का संहार करनेवाली स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं। प्रभु प्राप्ति के लिए धीर पुरुष यज्ञशील बनता है और स्तुति करता है। २. वह (एक:) = अद्वितीय प्रभु ही (मे) = मेरे (विश्वानि वचांसि) = सब स्तुति प्रार्थना वचनों को (शृणवत्) = सुनता है। मेरी प्रार्थनाओं को सुनकर उन प्रार्थनाओं की पूर्ति के लिए (पुरुप्रैषः) = पालक व पूरक निर्देशोंवाला वह प्रभु है। मैं प्रार्थना करता हूँ। उसकी पूर्ति के लिए प्रभु मुझे मार्ग का निर्देश ही नहीं उसपर चलने के लिए शक्ति भी देते हैं और इस प्रकार (ततुरिः) = वे सब (विघ्न) = बाधाओं से तारनेवाले हैं, (यज्ञसाधनः) = विघ्नों से तारकर हमारे यज्ञों को सिद्ध करनेवाले हैं। ३. यज्ञों— उत्तम कर्मों की सिद्धि के द्वारा वे प्रभु (अच्छिद्रोतिः) = निर्दोष व अन्तर से शून्य (निरन्तर) रक्षणवाले हैं। वे प्रभु सदा हमारा रक्षण कर रहे हैं। (शिशुः) = हमारी बुद्धियों को तीक्ष्ण करनेवाले हैं। इन बुद्धियों के अनुसार (संरभ:) = [रभू - to begin] कार्यों का सम्यक् आरम्भ करनेवालों को (आदत्त) = प्रभु अपनी गोद में ग्रहण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यज्ञ व स्तुतियाँ हमें प्रभु की ओर ले चलती हैं। प्रभु हमारी प्रार्थनाओं को सुनकर उनकी पूर्ति के लिए साधनों का निर्देश करते हैं, उन्हें पालन के लिए बुद्धि व शक्ति देते हैं । जो सम्यक् कार्यों का आरम्भ करता है, उसे प्रभु ग्रहण करते हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे विद्वान् भवानेको मे विश्वानि वचांसि शृणवद्यो रभः पुरुप्रैषस्ततुरिर्यज्ञसाधनोऽछिद्रोऽतिः शिशुः सर्वोपकारं कर्त्तुं प्रयत्नं समादत्त यं धीमन्तो गच्छन्ति तमर्वतीर्गच्छन्ति तमिज्जुह्वो गच्छन्ति ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) (इत्) एव (गच्छन्ति) प्राप्नुवन्ति (जुह्वः) विद्याविज्ञाने आददत्यः (तम्) (अर्वतीः) प्रशस्तबुद्धिमत्यः कन्याः (विश्वानि) अखिलानि (एकः) अद्वितीयः (शृणवत्) शृणुयात् (वचांसि) प्रश्नरूपाणि (वचनानि) (मे) मम (पुरुप्रैषः) पुरुभिर्बहुभिः सज्जनैः प्रैषः प्रेरितः (ततुरिः) दुःखात् सर्वान् सन्तारकः (यज्ञसाधनः) यज्ञस्य विद्वत्सत्कारस्य साधनानि यस्य (अच्छिद्रोतिः) अच्छिद्राऽप्रच्छिन्नाऽद्वैधीभूता ऊती रक्षणादिक्रिया यस्मात् सः (शिशुः) अविद्यादिदोषाणां तनूकर्त्ता (आ) समन्तात् (अदत्त) गृह्णीयात् (सम्) (रभः) महान् ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्यद्यद्विदितं यद्यदधीतं तस्य तस्य परीक्षामाप्ताय विदुषे यथा प्रदद्युरेवं कन्या अपि स्वाध्यापिकायै परीक्षां प्रदद्युर्नैवं विना सत्याऽसत्ययोस्सम्यग् निर्णयो भवितुमर्हति ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as ladles of ghrta reach agni, fire of yajna, so do youth of noble speech and blessed intelligence reach Agni, lord of brilliance and exalted soul, bearing questions and homage. May the lord, sole master of knowledge, unique and unparallelled, listen to my prayers and questions too, lord inspirer of many, instant saviour of the seekers, master of yajnic accomplish ments, giver of faultless protection, dispeller of doubts and darkness, all-great and loving, gracefully receiving and acknowledging questions as well as the homage of yajna.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The enlightened leaders are eulogized.

अन्वय:

O learned leader! you being the best among us listen to all our requests or questions. You are indeed great, admired by many good men. You ward off all miseries, possess the resources of honoring enlightened man. You are also protector of righteous persons, destroyer of all ignorance and other evils. Try always to do good to all. It is such an enlightened leader whom highly, intelligent girls and otherwise and knowledgeable people approach and seek his guidance.

भावार्थभाषाः - It is the duty of men to seek guidance from the absolutely truthful learned persons. Girls also should do likewise. Failing in it, it is not possible to get correct knowledge to distinguish between the true and false.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी, जे जे जाणले व जे जे वाचले त्याची परीक्षा अध्यापकासमोर व विद्वानांसमोर जशी दिली जाते तशी परीक्षा मुलींनीही आपल्या अध्यापिकांसमोर द्यावी, असे केल्याशिवाय सत्यासत्याचा सम्यक निर्णय होणार नाही. ॥ ३ ॥