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अ॒स्य त्वे॒षा अ॒जरा॑ अ॒स्य भा॒नव॑: सुसं॒दृश॑: सु॒प्रती॑कस्य सु॒द्युत॑:। भात्व॑क्षसो॒ अत्य॒क्तुर्न सिन्ध॑वो॒ऽग्ने रे॑जन्ते॒ अस॑सन्तो अ॒जरा॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asya tveṣā ajarā asya bhānavaḥ susaṁdṛśaḥ supratīkasya sudyutaḥ | bhātvakṣaso aty aktur na sindhavo gne rejante asasanto ajarāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य। त्वे॒षाः। अ॒जराः॑। अ॒स्य। भा॒नवः॑। सु॒ऽस॒न्दृशः॑। सु॒ऽप्रती॑कस्य। सु॒ऽद्युतः॑। भाऽत्व॑क्षसः। अति॑। अ॒क्तुः। न। सिन्ध॑वः। अ॒ग्नेः। रे॒ज॒न्ते॒। अस॑सन्तः। अ॒जराः॑ ॥ १.१४३.३

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:143» मन्त्र:3 | अष्टक:2» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:21» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (सुसंदृशः) सत्य और असत्य को ज्ञानदृष्टि से देखनेवाले (सुप्रतीकस्य) सुन्दर प्रतीतियुक्त (सुद्युतः) सब ओर से प्रकाशमान (अग्नेः) सूर्य के (भानवः) किरणों के समान (अस्य) इस अध्यापक के (अजराः) विनाशरहित (त्वेषाः) विद्या और शील के प्रकाश होते हैं और वे (अस्य) इस महाशय के (अजराः) अजर-अमर (अससन्तः) जागते हुए (भात्वक्षसः) विद्या प्रकाशरूपी बलवाले (सिन्धवः) प्रवाहरूप उक्त तेज (अक्तुः) रात्रि के (न) समान अविद्यान्धकार को (अति, रेजन्ते) अतिक्रमण करते हैं ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य सूर्य के समान विद्या के प्रकाश करने, अविद्यान्धकार के विनाश करने और सबको आनन्द देनेवाले होते हैं वे ही मनुष्यों के शिरोमणि होते हैं ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वास्थ्य व ज्ञान की दीप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अस्य) = हृदयाकाश में प्रादुर्भूत होते हुए इस प्रभु की (त्वेषाः) = दीप्तियाँ अजरा न जीर्ण होनेवाली हैं। प्रभु हृदयस्थ होते हैं तो हमारा शरीर स्वास्थ्य की दीप्ति से चमक उठता है। (अस्य भानव:) = इस प्रभु की ज्ञान दीप्तियाँ (सुसन्दृशः) = प्रत्येक पदार्थ को उत्तमता से ठीक रूप में देखनेवाली होती हैं। हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा से हम प्रत्येक पदार्थ को ठीक रूप में देखते हैं। २. (सुप्रतीकस्य) = उस तेजस्वी (सुद्युतः) = उत्तम ज्ञान की ज्योतिवाले (अग्नेः) = प्रभु की (भात्वक्षसः) = भासमान शक्तियाँ [त्वक्ष इति बलनामसु - नि०] (अत्यक्तुः न) = [अक्तुः - नैशं तमः] रात्रि के अन्धकार को लाँघती हुई-सी (सिन्धवः) = [स्यन्दन्ते] चारों ओर बहनेवाली (अससन्तः) = न सोनेवाली, निरन्तर अपने कार्य को करनेवाली, (अजरा:) = जीर्ण न होनेवाली (रेजन्ते) = सर्वत्र व्याप्त होती हैं। प्रभु के उपासन से जीव भासमान शक्तियों को प्राप्त करता है और 'सुप्रतीक व सुद्युत' हो उठता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का उपासक स्वास्थ्य व ज्ञान की दीति प्राप्त करता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्वद्विषयमाह ।

अन्वय:

हे मनुष्याः सुसंदृशः सुप्रतीकस्य सुद्युतोऽग्नेर्भानवोऽस्याध्यापकस्याजराः त्वेषा भवन्ति। अस्याजरा अससन्तो भात्वक्षसः सिन्धवोऽक्तुर्नाति रेजन्ते ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) (त्वेषाः) विद्यासुशीलप्रकाशाः (अजराः) हानिरहिताः (अस्य) सूर्यस्य (भानवः) किरणा इव (सुसंदृशः) सत्यासत्ययोः सुष्ठु सम्यग्द्रष्टुः (सुप्रतीकस्य) सुष्ठुप्रतीतियुक्तस्य (सुद्युतः) अभितः प्रकाशमानस्य (भात्वक्षसः) भाः विद्याप्रकाशस्त्वक्षं बलं यासां ताः। त्वक्ष इत बलना०। निघं० २। ९। (अति) (अक्तुः) रात्रिः (न) इव (सिन्धवः) प्रवाहरूपः (अग्नेः) सूर्यस्य (रेजन्ते) कम्पन्ते (अससन्तः) जागृताः (अजराः) हानिरहिताः ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्याः सूर्यवद्विद्याप्रकाशका अविद्याऽन्धकारनाशकाः सर्वषामानन्दप्रदा भवन्ति त एव मनुष्यशिरोमणयो जायन्ते ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The beams and brilliance of this holy light, clear and discerning of sight, beautiful of form and blazing with awe, are unaging, beyond decay. The waves of this mighty power of light flowing like rivers in flood are ever youthful, ever wakeful, they ever shine and dispel darkness as the dawn dispels the night.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of a learned person are further highlighted.

अन्वय:

A noble teacher is bright, he is capable to distinguish between the truth and untruth, possesses goo knowledge, shines on all sides on account of his virtues. He is always remembered. His rays of wisdom and character, like the sun, are everywhere visible and is intensely shining. Their strength is the light of knowledge and never fades out and is ever wakeful They dispel all darkness of ignorance.

भावार्थभाषाः - Illuminators of knowledge like the sun become the the best leaders of men. They are dispellers of darkness of ignorance and confer joy and bliss to all.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे सूर्यासारखी विद्या प्रकाशित करणारी, अविद्यान्धकाराचा नाश करणारी व सर्वांना आनंद देणारी असतात तीच माणसे माणसांमध्ये श्रेष्ठ असतात. ॥ ३ ॥