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घृ॒तव॑न्त॒मुप॑ मासि॒ मधु॑मन्तं तनूनपात्। य॒ज्ञं विप्र॑स्य॒ माव॑तः शशमा॒नस्य॑ दा॒शुष॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ghṛtavantam upa māsi madhumantaṁ tanūnapāt | yajñaṁ viprasya māvataḥ śaśamānasya dāśuṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

घृ॒तऽव॑न्तम्। उप॑। मा॒सि॒। मधु॑ऽमन्तम्। त॒नू॒ऽन॒पा॒त्। य॒ज्ञम्। विप्र॑स्य। माऽव॑तः। श॒श॒मा॒नस्य॑। दा॒शुषः॑ ॥ १.१४२.२

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:142» मन्त्र:2 | अष्टक:2» अध्याय:2» वर्ग:10» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:21» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (तनूनपात्) शरीर को नष्ट न करनेवाले विद्वन् ! आप (मावतः) मेरे सदृश (दाशुषः) दानशील (शशमानस्य) और दुःख उल्लंघन किये (विप्रस्य) मेधावी जन के (घृतवन्तम्) बहुत घृत और (मधुमन्तम्) प्रशंसित मधुरादि गुणों से युक्त (यज्ञम्) यज्ञ का (उप, मासि) परिमाण करनेवाले हो ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - विद्यार्थियों को विद्वानों की सङ्गति कर विद्वानों के सदृश होना चाहिये ॥ २ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'स्वस्थ, दीप्त, मधुर' जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (तनूनपात्) = हमारे शरीरों को न गिरने देनेवाले प्रभो! आप (यज्ञम्) = जीवनयज्ञ को (घृतवन्तम्) = मलों के क्षरण द्वारा स्वस्थ शरीरवाला तथा ज्ञानदीप्तिवाला, (मधुमन्तम्) = और माधुर्यवाला, (उप मासि) = समीप रहते हुए बनाते हैं। उस तनूनपात् प्रभु की कृपा से हमारा जीवन शरीर में स्वास्थ्यवाला, मस्तिष्क में ज्ञानदीप्तिवाला तथा हृदय में माधुर्यवाला होता है। २. प्रभु ऐसा जीवन यज्ञ किसका बनाते हैं? उसका जो [क] (विप्रस्य) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाला है, [ख] (मा वत:) = जो मा प्रमा ज्ञानलक्ष्मीवाला है, [ग] (शशमानस्य) = [शंसमानस्य - निरु०] जो प्रभु का शंसन करता है अथवा जो प्लुतगतिवाला है, आलस्यशून्य, क्रियाशील है, [घ] (दाशुषः) = दाश्वान् है, देनेवाला अथवा प्रभु के प्रति अर्पण करनेवाला है। इस प्रकार 'विप्र, मावान्, शशमान व दाश्वान्' बनने पर हमारा जीवनयज्ञ स्वस्थ, दीप्त व माधुर्यवाला बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभुकृपा से हमारा जीवन 'स्वस्थ, दीप्त व मधुर' हो ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे तनूनपाद्विद्वँस्त्वं मावतो दाशुषः शशमानस्य विप्रस्य घृतवन्तं मधुमन्तं यज्ञमुपमासि ॥ २ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (घृतवन्तम्) बहुघृतयुक्तम् (उप) (मासि) परिमिमीषे (मधुमन्तम्) प्रशस्तमधुरादिगुणयुक्तम् (तनूनपात्) यस्तनूं शरीरं न पातयति तत्सम्बुद्धौ (यज्ञम्) (विप्रस्य) मेधाविनः (मावतः) मत्सदृशस्य (शशमानस्य) दुःखमुल्लङ्घतः (दाशुषः) दातुः ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - विद्यार्थिभिर्विदुषां संगतिं कृत्वा विद्वदुपमया भवितव्यम् ॥ २ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, light and spirit of yajna, protector and preserver of the body, you are the measure of yajna and with your presence bless the ghrta-sprinkled honey- sweet fragrant yajna of the adoring generous sagely yajamana faithful like me.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The pupils should emulate their teachers (Gurus).

अन्वय:

An ideal pupil does not allow his body to become weak and waste his energy. Such persons come and participate with Yajna performed by the intelligent persons. Likewise I make an attempt to rise above all kinds of miseries and grief and liberally donate for this cause.

भावार्थभाषाः - The pupils should become like enlightened ones and they should have association with wise and intellectual persons.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्यार्थ्यांनी विद्वानांची संगती करून विद्वानांसारखे बनावे. ॥ २ ॥