समि॑द्धो अग्न॒ आ व॑ह दे॒वाँ अ॒द्य य॒तस्रु॑चे। तन्तुं॑ तनुष्व पू॒र्व्यं सु॒तसो॑माय दा॒शुषे॑ ॥
samiddho agna ā vaha devām̐ adya yatasruce | tantuṁ tanuṣva pūrvyaṁ sutasomāya dāśuṣe ||
सम्ऽइ॑द्धः। अ॒ग्ने॒। आ। व॒ह॒। दे॒वान्। अ॒द्य। य॒तऽस्रु॑चे। तन्तु॑म्। त॒नु॒ष्व॒। पू॒र्व्यम्। सु॒तऽसो॑माय। दा॒शुषे॑ ॥ १.१४२.१
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब तेरह ऋचावाले एकसौ ब्यालीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अध्यापक और अध्येता के विषय को कहते हैं ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दिव्य गुण व उत्तम सन्तान
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाध्यापकाध्येतृविषयमाह ।
हे अग्ने पावक इव समिद्धो विद्वांस्त्वमद्य यतस्रुचे सुतसोमाय दाशुषे देवानावह पूर्व्यं तन्तुं तनुष्व ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Pointers for the teachers and students are mentioned.
A teacher shines well like fire with his wisdom and glaring knowledge, brings more such enlightened persons here in a Yajna. It gives benefit to the performer of Yajna, who is a liberal donor. In such a Yajna, the ladle (Sruva), is uplifted and the juice of Soma and other herbs it extracted. O teacher ! you extend and disseminate the knowledge which has been acquired from your forefathers.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अध्यापक अध्येता यांचे गुण व विद्येची प्रशंसा असल्याने या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे. ॥
