सु॒षु॒मा या॑त॒मद्रि॑भि॒र्गोश्री॑ता मत्स॒रा इ॒मे सोमा॑सो मत्स॒रा इ॒मे। आ रा॑जाना दिविस्पृशास्म॒त्रा ग॑न्त॒मुप॑ नः। इ॒मे वां॑ मित्रावरुणा॒ गवा॑शिर॒: सोमा॑: शु॒क्रा गवा॑शिरः ॥
suṣumā yātam adribhir gośrītā matsarā ime somāso matsarā ime | ā rājānā divispṛśāsmatrā gantam upa naḥ | ime vām mitrāvaruṇā gavāśiraḥ somāḥ śukrā gavāśiraḥ ||
सु॒षु॒म। आ। या॒त॒म्। अद्रि॑ऽभिः। गोऽश्री॑ताः। म॒त्स॒राः। इ॒मे। सोमा॑सः। मत्स॒राः। इ॒मे। आ। रा॒जा॒ना॒। दि॒वि॒ऽस्पृ॒शा॒। अ॒स्म॒ऽत्रा। ग॒न्त॒म्। उप॑। नः॒। इ॒मे। वा॒म्। मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒। गोऽआ॑शिरः। सोमाः॑। शु॒क्राः। गोऽआ॑शिरः ॥ १.१३७.१
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब दूसरे अष्टक में द्वितीय अध्याय का आरम्भ और तीन ऋचावाले एक सौ सैंतीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य इस संसार में किसके समान वर्त्ते, इस विषय को कहा है ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मित्रावरुण का सोमपान
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्याः किंवदत्र वर्त्तेरन्नित्याह ।
हे मित्रावरुणा दिविस्पृशा राजाना य इमेऽद्रिभिर्गोश्रीता मत्सरा वयं सुषुम तान्वां युवामायातम्। य इमे मत्सराः सोमासः सन्ति तानस्मत्राऽऽयातं य इमे गवाशिर इव शुक्राः सोमा गवाशिरस्तान्नोऽस्मांश्चोपागन्तम् ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should men behave like, is told.
O Mitra and Varuna (President of the State and Commander in-Chief of the Army) you are like Prana and udana, who shine on account of your virtues; where conduct is pure. You both come to our Yajna where we extract the juice of Soma and other herbs watered by the clouds. These juices with milk are givers of great joy, and are exhilarating. These juices with showers of the sun rays are givers of great delight. Come to us, to partake of the precious nutritive articles which are pure and are touched by the rays of the sun.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात सोमलतेच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे. ॥
