ता सु॑जि॒ह्वा उप॑ह्वये॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी। य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मम्॥
tā sujihvā upa hvaye hotārā daivyā kavī | yajñaṁ no yakṣatām imam ||
ता। सु॒ऽजि॒ह्वौ। उप॑। ह्व॒ये॒। होता॑रा। दैव्या॑। क॒वी इति॑। य॒ज्ञम् नः॒। य॒क्ष॒ता॒म्। इ॒मम्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में उन अग्नियों का उपदेश किया है कि जो शुद्ध करनेवाले विद्युद्रूप से अप्रसिद्ध और प्रत्यक्ष स्थूलरूप से प्रसिद्ध हैं-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दैव्या होतारा [प्राणापान]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्र शोधकौ प्रसिद्धाप्रसिद्धावग्नी उपदिश्येते।
अहं क्रियाकाण्डाऽनुष्ठाताऽस्मिन् गृहे यौ नोऽस्माकमिमं यज्ञं यक्षतां सङ्गमयतस्तौ सुजिह्वौ होतारौ कवी दैव्यावुपह्वये सामीप्ये स्पर्द्धे॥८॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
1-the performer of Yajna and practical work invoke two kinds of fire (electricity and material visible fire) which possess good tongues in the form of flame, are takers of various articles, the cause of vision and divine which accomplish this Yajna in the form of homa (fire sacrifice) and Shilpa i. e. art and industry.
