अग्ने॑ सु॒खत॑मे॒ रथे॑ दे॒वाँ ई॑ळि॒त आ व॑ह। असि॒ होता॒ मनु॑र्हितः॥
agne sukhatame rathe devām̐ īḻita ā vaha | asi hotā manurhitaḥ ||
अग्ने॑। सु॒खऽत॑मे। रथे॑। दे॒वान्। इ॒ळि॒तः। आ। व॒ह॒। असि॑। होता॑। मनुः॑ऽहितः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
उक्त अग्नि इस प्रकार उपकार में लिया हुआ किसका हेतु होता है, सो उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुखतम - रथ
स्वामी दयानन्द सरस्वती
स एवमुपकृतः किंहेतुको भवतीत्युपदिश्यते।
मनुष्यैर्योऽग्निर्मनुर्होतेडितोऽस्ति स सुखतमे रथे हितः स्थापितः सन् देवानावह समन्ताद्वहति देशान्तरं प्रापयति॥४॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The same subject is continued in the fourth Mantra.
Agni (fire) when used in the most easy going Chariot (in the form of aero plane etc.) which confers happiness upon its passengers, gives divine enjoyments. It is used by wise men for the accomplishment of various acts and is very beneficent.
