नरा॒शंस॑मि॒ह प्रि॒यम॒स्मिन्य॒ज्ञ उप॑ह्वये। मधु॑जिह्वं हवि॒ष्कृत॑म्॥
narāśaṁsam iha priyam asmin yajña upa hvaye | madhujihvaṁ haviṣkṛtam ||
नरा॒शंस॑म्। इ॒ह। प्रि॒यम्। अ॒स्मिन्। य॒ज्ञे। उप॑। ह्व॒ये॒। मधु॑ऽजिह्वम्। ह॒विः॒ऽकृत॑म्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में मनुष्यों के प्रशंसा करने योग्य भौतिक अग्नि के गुणों का उपदेश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
हविष्कृत् मधुजिह्व
स्वामी दयानन्द सरस्वती
नरैः प्रशंसनीयस्य भौतिकाग्नेर्गुणा उपदिश्यन्ते।
अहमस्मिन् यज्ञे इह संसारे च हविष्कृतं मधुजिह्वं प्रियं नराशंसमग्निमुपह्वय उपगम्योपतापये॥३॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of Agni which is admired by all are told in the 3rd Mantra.
I kindle the fire in this Yajna (non-violent sacrifice) which is beloved and beneficent to the people, the sweet tongued(which makes things sweet) and in which oblations are put.
