अव॑ सृजा वनस्पते॒ देव॑ दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः। प्र दा॒तुर॑स्तु॒ चेत॑नम्॥
ava sṛjā vanaspate deva devebhyo haviḥ | pra dātur astu cetanam ||
अव॑। सृ॒ज॒। व॒न॒स्प॒ते॒। देव॑। दे॒वेभ्यः॑। ह॒विः। प्र। दा॒तुः। अ॒स्तु॒। चेत॑नम्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
वह अग्नि किससे प्रज्वलित हुआ इन कार्य्यों को सिद्ध करता है, इसका उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
चैतन्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
सोऽग्निः केन प्रदीप्तः सन्नेत्कार्य्यं साधयतीत्युपदिश्यते।
अयं देवो वनस्पतिर्देवेभ्यस्तद्धविरवसृजति यत्प्रदातुः सर्वपदार्थशोधयितुर्विदुषश्चेतनमस्तु भवति॥११॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The plant (without flowers) that is the protector of the forests and the herbs etc. on account of rains, is the giver of fruits, generates articles to be put in the fire as oblation, for divine attributes. That increases the knowledge of the learned person who desires the purification of all things.
