सुस॑मिद्धो न॒ आव॑ह दे॒वाँ अ॑ग्ने ह॒विष्म॑ते। होतः॑ पावक॒ यक्षि॑ च॥
susamiddho na ā vaha devām̐ agne haviṣmate | hotaḥ pāvaka yakṣi ca ||
सुऽस॑मिद्धः। नः॒। आ। व॒ह॒। दे॒वान्। अ॒ग्ने॒। ह॒विष्म॑ते। होत॒रिति॑। पा॒व॒क॒। यक्षि॑। च॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब तेरहवें सूक्त के अर्थ का आरम्भ करते हैं। इसके प्रथम मन्त्र में परमेश्वर और भौतिक अग्नि के गुणों का उपदेश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुसमिद्ध अग्नि [पवित्रता व प्रभु - प्राप्ति]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्र तावत्परमेश्वरभौतिकाग्न्योर्गुणा उपदिश्यन्ते।
हे होतः पावकाग्ने विश्वेश्वर ! यतः सुसमिद्धस्त्वं कृपया नोऽस्मभ्यं हविष्मते च देवानावहसि प्रापयस्यतोऽहं भवन्तं नित्यं यक्षि यजामीत्येकः। यतोऽयं पावको होता सुसमिद्धोऽग्निर्नोऽस्मभ्यं हविष्मते च देवानावहति समन्तात् प्रापयति तस्मादेतमहं नित्यं यक्षि यजामि सङ्गतं करोमीति द्वितीयः॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
In the first Mantra, the attributes of God and fire are taught.
(1) O purifying Lord of the universe, well-kindled within (meditated upon) Thou bringest divine virtues and articles to him, who puts oblations in the fire and offers holy. (2) gifts of devotion to Thee. Therefore, I always worship Thee as Thou art Giver of knowledge, peace and bliss. I utilize properly the fire which when kindled well brings. divine things to the person who is the performer of Yajna.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या तेराव्या सूक्ताच्या अर्थाची, अग्नी इत्यादी दिव्य पदार्थांचा उपयोग करून घेण्याच्या विधानामुळे बाराव्या सूक्ताच्या अभिप्रायाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
