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एवे॑न स॒द्यः पर्ये॑ति॒ पार्थि॑वं मुहु॒र्गी रेतो॑ वृष॒भः कनि॑क्रद॒द्दध॒द्रेत॒: कनि॑क्रदत्। श॒तं चक्षा॑णो अ॒क्षभि॑र्दे॒वो वने॑षु तु॒र्वणि॑:। सदो॒ दधा॑न॒ उप॑रेषु॒ सानु॑ष्व॒ग्निः परे॑षु॒ सानु॑षु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evena sadyaḥ pary eti pārthivam muhurgī reto vṛṣabhaḥ kanikradad dadhad retaḥ kanikradat | śataṁ cakṣāṇo akṣabhir devo vaneṣu turvaṇiḥ | sado dadhāna upareṣu sānuṣv agniḥ pareṣu sānuṣu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

एवे॑न। स॒द्यः। परि॑। ए॒ति॒। पार्थि॑वम्। मु॒हुः॒ऽगीः। रेतः॑। वृ॒ष॒भः। कनि॑क्रदत्। दधत्। रेतः॑। कनि॑क्रदत्। श॒तम्। चक्षा॑णः। अ॒क्षऽभिः॑। दे॒वः। वने॑षु। तु॒र्वणिः॑। सदः॑। दधा॑नः। उप॑रेषु। सानु॑षु। अ॒ग्निः। परे॑षु। सानु॑षु ॥ १.१२८.३

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:128» मन्त्र:3 | अष्टक:2» अध्याय:1» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:19» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् ! आप जैसे (मुहुर्गीः) बार-बार वाणी को प्राप्त (रेतः) जल को (कनिक्रदत्) निरन्तर गर्जाता सा (रेतः) पराक्रम को (कनिक्रदत्) अतीव शब्दायमान करता और (दधत्) धारण करता हुआ (वृषभः) वर्षा करने और (वनेषु) किरणों में (तुर्वणिः) अन्धकार और शीत का विनाश करता हुआ (देवः) निरन्तर प्रकाशमान (उपरेषु) मेघों और (सानुषु) अलग अलग पर्वत के शिखरों वा (परेषु) उत्तम (सानुषु) पर्वतों के शिखरों में (सदः) जिनमें जन बैठते हैं, उन स्थानों को (दधानः) धारण करता हुआ (अग्निः) बिजुली तथा सूर्यरूप अग्नि (एवेन) अपनी लपट-झपट चाल से (पार्थिवम्) पृथिवी में जाने हुए पदार्थ को (सद्यः) शीघ्र (पर्येति) सब ओर से प्राप्त होता वैसे (अक्षभिः) इन्द्रियों से (शतम्) सैकड़ों उपदेशों को (चक्षाणः) करनेवाले होते हुए प्रसिद्ध हूजिये ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य और वायु सबको धारण और मेघ को वर्षाकर सब जगत् का आनन्द करते, वैसे विद्वान् जन वेद विद्या को धारण कर औरों के आत्माओं में अपने उपदेशों को वर्षा कर सब मनुष्यों को सुख देते हैं ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु का निवास किन में ?

पदार्थान्वयभाषाः - १. वह प्रभु (एवेन) = क्रियाशीलता के द्वारा (सद्यः) = शीन (पार्थिवम्) = पार्थिव शरीरधारी मनुष्य को (पर्येति) सर्वथा प्राप्त होता है । अकर्मण्य को कभी प्रभुदर्शन नहीं होता । इस क्रियाशीलता के लिए प्रभु (मुहुर्गीः) = बारम्बार प्रेरणात्मक वाणीवाले होते हैं, हृदयस्थ प्रभु इसे निरन्तर प्रेरणा देते हैं । रेतः वे प्रभु शक्ति के पुञ्ज हैं और (वृषभः) = सब सुखों की वर्षा करनेवाले हैं । (कनिक्रदत्) = 'ज्ञान, कर्म व उपासना' इन तीन वाणियों का उच्चारण करते हुए प्रभु [तिस्रो वाच उदीरते हरिरेति कनिक्रदत्] (रेतः दधत्) = शक्ति को धारण करते हैं । हममें शक्ति के धारण के हेतु से वे प्रभु हमें तीन प्रेरणाएँ देते हैं - [क] मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त करने का प्रयत्न करो, [ख] हृदय को उपासना में लीन करो तथा [ग] हाथों से यज्ञादि उत्तम कर्मों को सिद्ध करो । (कनिक्रदत) = वे प्रभु बारम्बार यही गर्जना कर रहे हैं । २. (देवः) = वे प्रकाशमय प्रभु (शतम्) = सौ वर्षपर्यन्त (अक्षभिः) = इन्द्रियों से (चक्षाणः) = हमारे लिए जीवन-मार्ग को दिखानेवाले हैं और (वनेषु) = उपासकों में (तुर्वणिः) = काम-क्रोधादि शत्रुओं का हिंसन करनेवाले हैं । प्रभु मार्ग दिखाते हैं, मार्ग पर चलनेवालों को शक्ति देते हैं और उनके क्रोधादि शत्रुओं का हिंसन करते हैं । ३. जिनके कामादि शत्रु नष्ट हो जाते हैं, वे सदा यज्ञशील बनते हैं और जीवन में उत्कर्ष के शिखर पर पहुंचते हैं । इन (उपरेषु) = [उपरमन्ते एषु अग्नयः] यज्ञशील पुरुषों के गृहों में (सानुषु) = जो उत्कृष्ट जीवनवाले बने हैं उनमें (सदः दधानः) = प्रभु स्थान ग्रहण करते हैं । इन्हीं के घरों में प्रभु का निवास होता है । वस्तुतः वे (अग्निः) = अग्रणी प्रभु (परेषु) = उत्कृष्ट (सानुषु) = शिखर पर पहुँचनेवाले मनुष्यों में रहते हैं । ये अग्नि के उपासक ही तो उत्कृष्ट व शिखर पर पहुँचनेवाले बन पाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु क्रियाशील को प्राप्त होते हैं, उसी के लिए मार्गदर्शक होते हैं । इस मार्ग पर चलता हुआ व्यक्ति शिखर पर पहुँचता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ।

अन्वय:

हे विद्वांस्त्वं यथा मुहुर्गी रेतः कनिक्रददिव रेतः कनिक्रदद्दधद्वृषभो वनेषु तुर्वणिर्देव उपरेषु सानुषु परेषु सानुषु च सदो दधानोऽग्निरेवेन पार्थिवं सद्यः पर्येति तथाऽक्षभिः शतं चक्षाणो भव ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (एवेन) गमनेन (सद्यः) शीघ्रम् (परि) सर्वतः (एति) प्राप्नोति (पार्थिवम्) पृथिव्यां विदितम् (मुहुर्गीः) मुहुर्मुहुर्गिरं प्राप्तः (रेतः) जलम् (वृषभः) वर्षकः (कनिक्रदत्) भृशं शब्दयन् (दधत्) धरन् (रेतः) वीर्यम् (कनिक्रदत्) अत्यन्तं शब्दयन् (शतम्) असंख्यातानुपदेशान् (चक्षाणः) उपदिशन् (अक्षभिः) इन्द्रियैः (देवः) देदीप्यमानः (वनेषु) रश्मिषु (तुर्वणिः) तमः शीतं हिंसन् (सदः) सीदन्ति येषु तान् (दधानः) धरन् (उपरेषु) मेघेषु (सानुषु) विभक्तेषु शिखरेषु (अग्निः) विद्युत्सूर्यरूपः (परेषु) उत्कृष्टेषु (सानुषु) शैलशिखरेषु ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यो वायुश्च सर्वं धृत्वा मेघं वर्षयित्वा सर्वं जगदानन्दयति तथा विद्वांसो वेदविद्यां धृत्वाऽन्येषामात्मसूपदेशान् वर्षयित्वा सर्वान् मनुष्यान् सुखयन्ति ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light, constantly goes by his path, pervading all that is in the world, celebrated in the voices of the divines, life of life, generous shower of vitality, roaring, wielding life and still roaring. The lord of brilliance, breaking and building in waves of energy, watching and illuminating the worlds with a hundred lights, holding, wielding and supporting the homes of life in the clouds, over the peaks, in the farthest regions of space on top, he goes on and on in the orbit along the circumference.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

As Agni in the form of lightning is loud-sounding, vigorous and much loud-sounding and it pierces by its force the cloud to rain down and Agni in the form of the bright sun also through its rays dispels darkness and cloud, present in the clouds and the tops of the hill pervades the earthly objects, in the same manner, thou shouldst diffuse knowledge among the people with the help of thy senses and by all thy movements.

पदार्थान्वयभाषाः - (रेत:) जलम् = Water. (रेतः) २ वीर्यम्= Semen (वनेषु ) रश्मिषु = In the rays. (तुर्वणिः) तमः शीतं हिंसन् = Dispelling darkness and cold.
भावार्थभाषाः - As the sun and the air uphold all and gladden the world by making the cloud rain down water, in the same manner, learned persons should make all people happy by raining sermons in their souls i. e. by enlightening them well.
टिप्पणी: वनमिति रश्मिनाम (निघ० १.५ ) इत्युदक नाम (निघ० १.१२ ) वन-हिंसायाम्
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे सूर्य व वायू सर्वांना धारण करून मेघाचा वर्षाव करून संपूर्ण जगात आनंद पसरवितात तसे विद्वान लोक वेद विद्या धारण करून इतरांच्या आत्म्यात आपल्या उपदेशांचा वर्षाव करून सर्व माणसांना सुख देतात. ॥ ३ ॥