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का रा॑ध॒द्धोत्रा॑श्विना वां॒ को वां॒ जोष॑ उ॒भयो॑:। क॒था वि॑धा॒त्यप्र॑चेताः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kā rādhad dhotrāśvinā vāṁ ko vāṁ joṣa ubhayoḥ | kathā vidhāty apracetāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

का। रा॒ध॒त्। होत्रा॑। अ॒श्वि॒ना॒। वा॒म्। कः। वा॒म्। जोषे॑। उ॒भयोः॑। क॒था। वि॒धा॒ति॒। अप्र॑ऽचेताः ॥ १.१२०.१

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:120» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:8» वर्ग:22» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:17» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब एकसौ बीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में प्रश्नोत्तरविधि का उपदेश करते हैं ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अश्विना) गृहाश्रम धर्म में व्याप्त स्त्री-पुरुषो ! (वाम्) तुम (उभयोः) दोनों की (का) कौन (होत्रा) सेना शत्रुओं के बल को लेने और उत्तम जीत देने की (राधत्) सिद्धि करे (वाम्) तुम दोनों के (जोषे) प्रीति उत्पन्न करनेहारे व्यवहार में (कथा) कैसे (कः) कौन (अप्रचेताः) विद्या विज्ञान रहित अर्थात् मूढ़ शत्रु-हार को (विधाति) विधान करे ॥ १ ॥
भावार्थभाषाः - सभासेनाधीश शूर और विद्वान् के व्यवहारों को जाननेहारों के साथ अपना व्यवहार करें फिर शूर और विद्वान् के हार देने और उनकी जीत को रोकने को समर्थ हों, कभी किसी का मूढ़ के सहाय से प्रयोजन नहीं सिद्ध होता। इससे सब दिन विद्वानों से मित्रता रक्खें ॥ १ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणों का विरल उपासक

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अश्विना) = प्राणापानो ! (का होत्रा) = कोई विरल वाणी ही (वां राधत्) = आपकी आराधना करती है , अर्थात् सामान्यतः लोग आपकी आराधना में प्रवृत्त नहीं होते । २. (वाम् उभयोः) = आप दोनों के (जोषे) = प्रीणन में (कः) = कोई विरल ही समर्थ होता है । ३. (अप्रचेताः) = एक नासमझ मूर्ख व्यक्ति (कथा विधाति) = कैसे आपकी परिचर्या कर सकता है । आपके लाभों को न समझने पर आपकी उपासना में किसी की प्रवृत्ति हो ही कैसे सकती है ? किसी वस्तु की उपयोगिता को समझने पर ही उसमें प्रवृत्ति हुआ करती है । प्राणसाधना का भी लाभ समझेंगे तभी तो उधर प्रवृत्त होंगे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना के लाभ का ज्ञान न होने से प्राणसाधना में प्रवृत्ति कम ही होती है ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

तत्रादौ प्रश्नोत्तरविधिमाह ।

अन्वय:

हे अश्विना वामुभयोः का होत्रा सेना विजयं राधत्। वां जोषे कथा कोऽप्रचेताः पराजयं विधाति ॥ १ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (का) सेना (राधत्) राध्नुयात् (होत्रा) शत्रुबलमादातुं विजयं च दातुं योग्या (अश्विना) गृहाश्रमधर्मव्यापिनौ स्त्रीपुरुषौ (वाम्) युवयोः (कः) शत्रुः (वाम्) युवयोः (जोषे) प्रीतिजनके व्यवहारे (उभयोः) (कथा) केन प्रकारेण (विधाति) विदध्यात् (अप्रचेताः) विद्याविज्ञानरहितः ॥ १ ॥
भावार्थभाषाः - सभासेनेशौ शूरविद्वद्व्यवहाराभिज्ञैः सह व्यवहरेतां पुनरेतयोः पराजयं कर्त्तुं विजयं निरोद्धुं समर्थौ स्यातां न कदाचित्कस्यापि मूर्खसहायेन प्रयोजनं सिध्यति तस्मात्सदा विद्वन्मैत्रीं सेवेताम् ॥ १ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - What call, Ashvins, leaders and commanders, would rouse you to action and victory? Who could, if he were ignorant and unintelligent, lead you to victory and win your pleasure, and how? (None of the ignorant and unintelligent.)

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

In the first Mantra, the method of question and answer is taught.

अन्वय:

O Ashvinau (The President of the Assembly and Commander of the Army) or householders husband and wife, which is the conquering and subduing army that can make you victorious ? Who is the ignorant person that can defeat or put obstacles in your loving dealing ?

पदार्थान्वयभाषाः - (होत्रा) शत्रुबलम् आदातुं विजयं च दातुं योग्या सेना | = The army that can subdue enemies and achieve - victory over them. (अश्विना) गृहाश्रमधर्मव्यापिनौ स्त्रीपुरुषौ = Husband and wife pervading in or discharging the duties of a householder's life. (जोषे) प्रीतिजनके व्यवहारे = In a loving dealing.
भावार्थभाषाः - The President of the Assembly and Commander of the Army) should deal lovingly with the brave and learned persons. Then they can defeat their enemies and subdue them, getting victory over them. No work can be accomplished with the help of foolish persons and therefore a man should always keep friendship with learned persons.
टिप्पणी: अश्विनौ is from अशूङ्-व्याप्तौ जोषे is from जुषी-प्रीति सेवनयोः होत्रा is from हु-दानादनयोः आदाने च

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात प्रश्नोत्तर, अध्ययन - अध्यापन व राजधर्माच्या विषयाचे वर्णन असल्यामुळे या अर्थाची मागील सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे. ॥

भावार्थभाषाः - सभा सेनाधीश यांनी शूर विद्वानांच्या व्यवहारांना जाणणाऱ्यांबरोबर आपला व्यवहार करावा. ते शूर विद्वानांना पराजित करणारे व त्यांचा विजय रोखण्यास समर्थ असणारे असावेत. कोणाचेही प्रयोजन मूर्खाच्या साह्याने सिद्ध होत नाही. त्यामुळे नेहमी विद्वानांबरोबर मैत्री करावी. ॥ १ ॥