अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम्। अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म्॥
agniṁ dūtaṁ vṛṇīmahe hotāraṁ viśvavedasam | asya yajñasya sukratum ||
अ॒ग्निम्। दू॒तम्। वृ॒णी॒म॒हे॒। होता॑रम्। वि॒श्वऽवे॑दसम्। अ॒स्य। य॒ज्ञस्य॑। सु॒ऽक्रतु॑म्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब बारहवें सूक्त के प्रथम मन्त्र में भौतिक अग्नि के गुणों का उपदेश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अग्नि - वरण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्रादौ भौतिकगुणा उपदिश्यन्ते।
वयं क्रियाचिकीर्षवो मनुष्या अस्य यज्ञस्य सुक्रतुं विश्ववेदसं होतारं दूतमग्निं वृणीमहे॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
We desirous of various actions, choose the fire which takes things to distant places and gives them heat, which gives speed to various vehicles and which is instrumental in producing various articles by artists and by means of which many things are made in the form of art and industry.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या बाराव्या सूक्ताच्या अर्थाची अग्नी शब्दाच्या अर्थाच्या योगाने अकराव्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
