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पु॒रू वर्पां॑स्यश्विना॒ दधा॑ना॒ नि पे॒दव॑ ऊहथुरा॒शुमश्व॑म्। स॒ह॒स्र॒सां वा॒जिन॒मप्र॑तीतमहि॒हनं॑ श्रव॒स्यं१॒॑तरु॑त्रम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

purū varpāṁsy aśvinā dadhānā ni pedava ūhathur āśum aśvam | sahasrasāṁ vājinam apratītam ahihanaṁ śravasyaṁ tarutram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒रु। वर्पां॑सि। अ॒श्वि॒ना॒। दधा॑ना। नि। पे॒दवे॑। ऊ॒ह॒थुः॒। आ॒शुम्। अश्व॑म्। स॒ह॒स्र॒ऽसाम्। वा॒जिन॑म्। अप्र॑तिऽइतम्। अ॒हि॒ऽहन॑म्। श्र॒व॒स्य॑म्। तरु॑त्रम् ॥ १.११७.९

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:117» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:8» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:17» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब यहाँ तारविद्या के मूल का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अश्विना) शिल्पीजनो ! (पुरु) बहुत (वर्पांसि) रूपों को (दधाना) धारण किए हुए तुम दोनों (पेदवे) शीघ्र जाने के लिये (श्रवस्यम्) पृथिवी आदि पदार्थों में हुए (अप्रतीतम्) गुप्त (वाजिनम्) वेगवान् (अहिहनम्) मेघ के मारनेवाले (सहस्रसाम्) हजारों कर्मों को सेवन करने (आशुम्) शीघ्र पहुँचानेवाले (तरुत्रम्) और समुद्र आदि से पार उतारनेवाले (अश्वम्) बिजुली रूप अग्नि को (न्यूहथुः) चलाओ ॥ ९ ॥
भावार्थभाषाः - ऐसे शीघ्र पहुँचानेवाले बिजुली आदि अग्नि के विना एक देश से दूसरे देश को सुख से जाने-आने तथा शीघ्र समाचार लेने को कोई समर्थ नहीं हो सकता है ॥ ९ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

‘आशु व तरुत्र’ इन्द्रियाश्व

पदार्थान्वयभाषाः - १.हे (अश्विना) = प्राणापानो ! आप (पुरू वर्पांसि) = पालक व पूरक रूपों को (दधाना) = धारण करते हुए (पेदवे) = [पद् गतौ] गतिशील पुरुष के लिए (अश्वम्) = उस इन्द्रियरूप अश्व को (ऊहथुः) = प्राप्त कराते हो जोकि (आशुम्) = कर्मों में व्याप्त होनेवाला है , अर्थात् प्राणसाधना से इन्द्रियों के मल दूर होकर उनकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है । ये प्राण हमें तेजस्वी बनाते हैं । हमारा रूप ओजस्विता से पूर्ण प्रतीत होता है । २. प्राणसाधना उस इन्द्रियाश्व को प्राप्त कराती है जो (सहस्त्रसाम्) = हमें सहस्र संख्याक धनों का प्राप्त करानेवाला है , (वाजिनम्) = शक्तिशाली है , (अप्रतीतम्) = [अ प्रति इतम्] जो शत्रुओं से आक्रान्त नहीं होता , (अहिहनम्) = [आहन्ति] वासनाओं को नष्ट करनेवाला है , (श्रवस्यम्) = वासना - विनाश के द्वारा ज्ञान - साधन के लिए उत्तम है और (तरुत्रम्) = सब विघ्नों को तैर जानेवाला है । इस प्रकार के इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करके हम जीवन यात्रा को क्यों न पूर्ण कर सकेंगे !
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना गतिशील को उत्तमरूप प्राप्त कराती है और इन्द्रियाश्वों को शीघ्रता से कर्मों में व्याप्त होनेवाला तथा विघ्नों से तैर जानेवाला बनाती है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथात्र तारविद्यामूलमाह ।

अन्वय:

हे अश्विना पुरु वर्पांसि दधाना सन्तौ युवां पेदवे श्रवस्यमप्रतीतं वाजिनमहिहनं सहस्रसामाशुं तरुत्रमश्वं न्यूहथुः ॥ ९ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरु) बहूनि। शेश्छन्दसीति शेर्लोपः। (वर्पांसि) रूपाणि (अश्विना) शिल्पिनौ (दधाना) धरन्तौ (नि) (पेदवे) गमनाय। पदधातोरौणादिरुः प्रत्ययो वर्णव्यत्ययेनास्यैकारश्च। (ऊहथुः) वाहयतम् (आशुम्) शीघ्रगमकम् (अश्वम्) विद्युदाख्यमग्निम् (सहस्रसाम्) सहस्राण्यसंख्यातानि कर्माणि सतति संभजति तम् (वाजिनम्) वेगवन्तम् (अप्रतीतम्) अदृश्यम् (अहिहनम) मेघस्य हन्तारम् (श्रवस्यम्) श्रवस्यन्ने पृथिव्यादौ भवम् (तरुत्रम्) समुद्रादितारकम् ॥ ९ ॥
भावार्थभाषाः - नहीदृशेन सद्योगमकेन विद्युदग्न्यादिना विना देशान्तरं सुखेन शीघ्रं गन्तुमागन्तुं सद्यः समाचारं ग्रहीतुं च कश्चिदपि शक्नोति ॥ ९ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of many things for good and comfortable life, assuming various forms of workers and designers, you give to the traveller and transporter the instant motive power such as electricity, fast, serving a thousand purposes, invisible, present in earth and consumable fuels, breaker of the cloud and capable of crossing the seas.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O Ashvins (artisans) you who are beautiful and assume various forms, give for quick movement a horse in the form of electricity which is present on the earth, is accomplisher of innumerable works, powerful, swift, rapid, invisible, destroyer of clouds and taking across the ocean.

पदार्थान्वयभाषाः - (पेदवे) गमनाय पदधातोरौणादिक उप्रत्यय:, वर्णव्यत्ययेनास्येकारश्च (अश्वम्) विद्युदाख्यमग्निम् = Fire in the form of electricity or quick movement. (अप्रतीतम्) अदृश्यम् = Invisible. (श्रवस्यम्) श्रवसि अन्ने पृथिव्यादौ भवम् = Presient on earth etc. (तरुत्रम् ) समुद्रादितारकम् = That takes across the ocean.
भावार्थभाषाः - It is not possible to go to distant countries easily and to get the news soon from distant places without the use of electricity to various steamers and telegraph etc.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्युत इत्यादी अग्नीशिवाय तात्काळ एका देशाहून दुसऱ्या देशात सुखपूर्वक जाण्यायेण्यासाठी व तात्काळ वार्ता कळण्यासाठी कोणी समर्थ असू शकत नाही. ॥ ९ ॥