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आ॒भो॒गयं॒ प्र यदि॒च्छन्त॒ ऐत॒नापा॑का॒: प्राञ्चो॒ मम॒ के चि॑दा॒पय॑:। सौध॑न्वनासश्चरि॒तस्य॑ भू॒मनाग॑च्छत सवि॒तुर्दा॒शुषो॑ गृ॒हम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ābhogayam pra yad icchanta aitanāpākāḥ prāñco mama ke cid āpayaḥ | saudhanvanāsaś caritasya bhūmanāgacchata savitur dāśuṣo gṛham ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ॒ऽभो॒गय॑म्। प्र। यत्। इ॒च्छन्तः॑। ऐत॑न। अपा॑काः। प्राञ्चः॑। मम॑। के। चि॒त्। आ॒पयः॑। सौध॑न्वनासः। च॒रि॒तस्य॑। भू॒मना॑। अग॑च्छत। स॒वि॒तुः। दा॒शुषः॑। गृ॒हम् ॥ १.११०.२

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:110» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:7» वर्ग:30» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:16» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (प्राञ्चः) प्राचीन (अपाकाः) रोटी आदि का स्वयं पाक तथा यज्ञादि कर्म न करनेहारे संन्यासी जनो ! आप जो (के, चित्) कोई जन (मम) मेरे (आपयः) विद्या में अच्छी प्रकार व्याप्त होने की कामना किए (यत्) जिस (आ भोगयम्) अच्छी प्रकार भोगने के पदार्थों में प्रशंसित भोग की (इच्छन्तः) चाह कर रहे हैं, उनको उसी भोग को (प्र, ऐतन) प्राप्त करो। हे (सौधन्वनासः) धनुष बाण के बाँधनेवालों में अतीव चतुरो ! जब तुम (भूमना) बहुत (चरितस्य) किये हुए काम के (सवितुः) ऐश्वर्य से युक्त (दाशुषः) दान करनेवाले के (गृहम्) घर को (आगच्छत) आओ तब जिज्ञासुओं अर्थात् उपदेश सुननेवालों के प्रति सांचे धर्म के ग्रहण करने का उपदेश करो ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - हे गृहस्थ आदि मनुष्यो ! तुम संन्यासियों से सत्य विद्या को पाकर, कहीं दान करनेवालों की सभा में जाकर, वहाँ युक्ति से बैठ और निरभिमानता से वर्त्तकर विद्या और विनय का प्रचार करो ॥ २ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सात्त्विक भोजन व उदार चरित्रता

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में वर्णित ऋभु सदा (यत् आभोगयम्) = जो सेवन के योग्य वस्तुएँ हैं , उन्हीं को (इच्छन्तः) = चाहते हुए (प्रएतन) = प्रकर्षेण गति करते हैं । वेद में जिन भोजनों को खाने की स्वीकृति दी गई है , उन्हीं सात्विक आहारों को करते हुए ये संसार में उत्कृष्ट मार्ग पर चलते हैं । आहार - शुद्धि से अन्तः करण शुद्ध होकर इनका जीवन पवित्र ही बना रहता है । वेद ने “मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च” इन शब्दों में हिंसा से लभ्य मांस - भोजन का निषेध किया है । ये ऋभु उस भोजन से सदा दूर रहते हुए अक्रूर कर्मोंवाले होते हैं ।  २. (अपाकाः) = अपक्तव्य प्रज्ञावाले , अर्थात् जिनके विचार परिपक्व हो चुके हैं , परिपक्तव्य नहीं हैं और जो (प्राञ्चः) = [प्र अञ्च] आगे और आगे बढ़ रहे हैं , ऐसे ही (केचित्) = कुछ लोग (मम आपयः) = मेरे मित्र हैं । अपरिपक्व विचारोंवाले व्यक्तियों के संग में हम भी अस्थिरमति हो जाते हैं । प्रगतिशील मित्रों के संग में हम भी आगे बढ़ते हैं । यहाँ ‘केचित्’ शब्द भी अत्युत्तम संकेत करता है - मित्रों की संख्या बहुत अधिक हो जाने पर उन सबके साथ ठीक व्यवहार बहुत अधिक समय की अपेक्षा करता है , उतना समय निकाल सकना कठिन हो जाता है , अतः यह ठीक ही है कि मित्रों की संख्या बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए ।  ३. (सौधन्वनासः) = उत्तम धनुषवाले [प्रणवो धनुः] प्रणव = ओम् को धनुष बनानेवाले , अर्थात् प्रणवरूप धनुष से आत्मारूप शर के द्वारा ब्रह्मरूप लक्ष्य का वेध करनेवाले तुम (चरितस्य भूमना) = चरित्र को विशालता से - उदार चरित्रता से उस (सवितुः) = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जन्म देनेवाले (दाशुषः) = सब आवश्यक पदार्थों को देनेवाले प्रभु के (गृहम्) = घर को (आगच्छत) = आओ । ऋभु प्रणव को अपना धनुष बनाते हैं “तस्य वाचकः प्रणवः , तज्जपस्तदर्थभावनम्” - इन योगसूत्रों के अनुसार प्रणव का जप व अर्थ - चिन्तन करते हैं । अपने चरित्र को उदार व विशाल बनाते हैं और इस प्रकार प्रभु को प्राप्त होनेवाले होते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ऋभु [क] उपभोग के योग्य आहारों का ही सेवन करते हैं , [ख] परिपक्व विचारोंवाले–प्रगतिशील कुछ मित्रों का चुनाव करते हैं , [ग] प्रणव का जप करते हैं , [घ] अपने चरित्र को उदार बनाते हैं । इस प्रकार ये प्रभु - प्राप्ति के अधिकारी बनते हैं ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ।

अन्वय:

हे प्राञ्चोऽपाका यतयो यूयं ये केचिन्ममापयो यद्ययमाभोगयमिच्छन्तो वर्त्तन्ते तान् तं प्रैतन्। हे सौधन्वनासो यदा यूयं भूमना चरितस्य सवितुर्दाशुषो गृहमगच्छत खल्वागच्छत तदा जिज्ञासून् प्रति सत्यधर्मग्रहणमुपदिशत ॥ २ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आभोगयम्) आसमन्ताद्भोगेषु साधुं व्यवहारम्। अत्रोभयसंज्ञान्यपि छन्दांसि दृश्यन्त इति भसंज्ञा निषेधादल्लोपाभावः। (प्र) (यत्) यम् (इच्छन्तः) (ऐतन) प्राप्नुत (अपाकाः) वर्जितपाकयज्ञा यतयः (प्राञ्चः) प्राचीनाः (मम) (के) (चित्) (आपयः) विद्याव्याप्तुकामाः (सौधन्वनासः) शोभनानि धन्वानि धनूंषि येषु ते सुधन्वानस्तेषु कुशला सौधन्वनाः (चरितस्य) अनुष्ठितस्य कर्मणः (भूमना) बहुत्वेन। अत्रोभयसंज्ञान्यपीति भसंज्ञाऽभावादल्लोपाभावः (आगच्छत) (सवितुः) ऐश्वर्य्ययुक्तस्य (दाशुषः) दानशीलस्य (गृहम्) निवासस्थानम् ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - हे गृहस्थादयो मनुष्या यूयं परिव्राजां सकाशात् सत्या विद्याः प्राप्य क्वचिद्दानशीलस्य सभां गत्वा तत्र युक्त्या स्थित्वा निरभिमानत्वेन वर्त्तित्वा विद्याविनयौ प्रचारयत ॥ २ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Saints and sages, living on alms and uncooked vegetables and fruits, men of ancient knowledge and wisdom, realised souls for me, if you wish to taste the joy and ecstasy of life, then, like heroes of the mighty bow, with all your wealth of noble action, come to the house of generous Savita, light and life of the universe.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O aged Sanyasis, go to those of my kith and kin who desire to acquire knowledge and good dealing leading to happiness. O men full of true wisdom and knowledge : When you go to the house of a man of charitable disposition who has become prosperous on account of good deeds done constantly, preach to the seekers of truth, to accept true Dharma

पदार्थान्वयभाषाः - (आभोगयम् ) आसमन्तात् भोगेषु साधुं व्यवहारम् । = Good treatment leading to the enjoyment of happiness. (अपाका:) वर्जितपाकयज्ञा यतयः (षू-प्रसर्वेश्वर्ययोः ) = Sanyasis (सवितुः) ऐश्वर्ययुक्तस्य = Of a rich man.
भावार्थभाषाः - O householders, you should acquire true knowledge sitting at the feet of the Sanyasis and when you go to the assembly of liberal persons, sit there properly and behaving humbly preach knowledge and humility.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे गृहस्थांनो ! तुम्ही संन्याशाकडून सत्य विद्या प्राप्त करा. दान करणाऱ्या एखाद्या सभेत जाऊन तेथे युक्तिपूर्वक बसून निरभिमानतेने वर्तन करून विद्या व विनयाचा प्रचार करा. ॥ २ ॥