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उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

upa tvāgne dive-dive doṣāvastar dhiyā vayam | namo bharanta emasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उप॑। त्वा॒। अ॒ग्ने॒। दि॒वेऽदि॑वे। दोषा॑ऽवस्तः। धि॒या। व॒यम्। नमः॑। भर॑न्तः। आ। इ॒म॒सि॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:1» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:2» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:1» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

उक्त परमेश्वर कैसे उपासना करके प्राप्त होने के योग्य है, इसका विधान अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सब के उपासना करने योग्य परमेश्वर ! (वयम्) हम लोग (धिया) अपनी बुद्धि और कर्मों से (दिवेदिवे) अनेक प्रकार के विज्ञान होने के लिये (दोषावस्तः) रात्रिदिन में निरन्तर (त्वा) आपकी (भरन्तः) उपासना को धारण और (नमः) नमस्कार आदि करते हुए (उपैमसि) आपके शरण को प्राप्त होते हैं॥७॥
भावार्थभाषाः - हे सब को देखने और सब में व्याप्त होनेवाले उपासना के योग्य परमेश्वर ! हम लोग सब कामों के करने में एक क्षण भी आपको नहीं भूलते, इसी से हम लोगों को अधर्म करने में कभी इच्छा भी नहीं होती, क्योंकि जो सर्वज्ञ सब का साक्षी परमेश्वर है, वह हमारे सब कामों को देखता है, इस निश्चय से॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के समीप

पदार्थान्वयभाषाः - गतमन्त्र में वर्णित समर्पण को ही स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि - हे ( अग्ने ) - हमें सब आवश्यक पदार्थों को प्राप्त करानेवाले प्रभो! ( वयम् ) - हम ( दिवेदिवे ) - प्रतिदिन ( दोषावस्तः ) - रात्रि और दिन, अर्थात् प्रातः सन्धिवेला और सायं सन्धिवेला में ( धिया ) - बुद्धिपूर्वक कर्मों के द्वारा ( नमः भरन्तः ) - पूजा को प्राप्त करते हुए [स्वकर्मणा तमभ्यर्च - गीता २८४६] त्वा, ( उप ) - आपके समीप ( एमसि ) - [आ इमसि] सर्वथा प्राप्त होते हैं । प्रतिदिन प्रातः - सायं प्रभु - चरणों में उपस्थित होना मानव के लिए इसलिए आवश्यक है कि इससे [क] पवित्रता की भावना बनी रहती है [ख] शक्ति का सञ्चार होता है [ग] जीवन का उद्देश्य धन ही नहीं बनता और परिणामतः पारस्परिक प्रेम विनष्ट नहीं होता ।  वस्तुतः जैसे शरीर के लिए भोजन है, जैसे मस्तिष्क के लिए स्वाध्याय है, उसी प्रकार हृदय के लिए यह "दैनिक ध्यान' है । जैसे भोजन के बिना शरीर निर्बल होकर रोगाक्रान्त हो जाता है, स्वाध्याय के बिना मस्तिष्क दुर्बल होकर ठीक विचार नहीं कर पाता, उसी प्रकार उपासना के बिना हृदय मलिन होकर वासनाओं से अभिभूत हो जाता है । भोजन शरीर को सबल बनाता है, स्वाध्याय मस्तिष्क को तथा उपासना हदय को बलवान् बनाने के लिए आवश्यक है ।
भावार्थभाषाः - हम प्रतिदिन प्रातः - सायं प्रभु का उपासन करनेवाले बनें । दिनभर प्रज्ञापूर्वक कार्यों को करते हुए हम उन्हें प्रभु - चरणों में अर्पित करें । प्रातः शक्ति की याचना करें कि हम प्रज्ञापूर्वक कर्मों को करनेवाले बन पाएँ ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

तद् ब्रह्म कथमुपास्य प्राप्तव्यमित्युपदिश्यते।

अन्वय:

हे अग्ने ! वयं धिया दिवेदिवे दोषावस्तस्त्वा त्वां भरन्तो नमस्कुर्वन्तश्चोपैमसि प्राप्नुमः॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उप) सामीप्ये (त्वा) त्वाम् (अग्ने) सर्वोपास्येश्वर ! (दिवेदिवे) विज्ञानस्य प्रकाशाय प्रकाशाय (दोषावस्तः) अहर्निशम्। दोषेति रात्रिनामसु पठितम्। (निघं०१.७) रात्रेः प्रसङ्गाद्वस्तर् इति दिननामात्र ग्राह्यम्। (धिया) प्रज्ञया कर्मणा वा (वयम्) उपासकाः (नमः) नम्रीभावे (भरन्तः) धारयन्तः (आ) समन्तात् (इमसि) प्राप्नुमः॥७॥
भावार्थभाषाः - हे सर्वद्रष्टः सर्वव्यापिन्नुपासनार्ह ! वयं सर्वकर्मानुष्ठानेषु प्रतिक्षणं त्वां यतो नैव विस्मरामः, तस्मादस्माकमधर्ममनुष्ठातुमिच्छा कदाचिन्नैव भवति। कुतः? सर्वज्ञः सर्वसाक्षी भवान्सर्वाण्यस्मत्कार्य्याणि सर्वथा पश्यतीति ज्ञानात्॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord omniscient, day by day, night and day, with all our heart and soul we come to you bearing gifts of homage in faith and humility.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is that God to be attained through communion is taught in the seventh Mantra.

अन्वय:

O God; in a spirit of humility and fervent sincere devotion making obeisance to Thee, we approach Thee day and night with our intellects and good actions, so that Thou wilt bless us with the light of true knowledge.

भावार्थभाषाः - O Omnipresent and Omniscient God who seest all, because we never forget Thee while engaged in the performance of all actions, we are never inclined to do unrighteous deeds. The reason is, the knowledge that Thou art Omniscient and therefore witness of all our actions, saves us from all evils and temptations.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे सर्व दृष्टा व सर्वात व्याप्त असणाऱ्या, उपासना करण्यायोग्य परमेश्वरा! आम्ही सर्व काम करताना एक क्षणही तुला विसरत नाही. यामुळे आम्हाला अधर्म करण्याची कधी इच्छाही होत नाही. या दृढ निश्चयाने की जो सर्वज्ञ, सर्वांचा साक्षी परमेश्वर आमच्या सर्व कामांना पाहतो. ॥ ७ ॥