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यद॒ङ्ग दा॒शुषे॒ त्वमग्ने॑ भ॒द्रं क॑रि॒ष्यसि॑। तवेत्तत्स॒त्यम॑ङ्गिरः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad aṅga dāśuṣe tvam agne bhadraṁ kariṣyasi | tavet tat satyam aṅgiraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत्। अ॒ङ्ग। दा॒शुषे॑। त्वम्। अग्ने॑। भ॒द्रम्। क॒रि॒ष्यसि॑। तव॑। इत्। तत्। स॒त्यम्। अ॒ङ्गि॒रः॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:1» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:2» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:1» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अग्नि शब्द से ईश्वर का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अङ्गिरः) ब्रह्माण्ड के अङ्ग पृथिवी आदि पदार्थों को प्राणरूप और शरीर के अङ्गों को अन्तर्यामीरूप से रसरूप होकर रक्षा करनेवाले हे (अङ्ग) सब के मित्र (अग्ने) परमेश्वर! (यत्) जिस हेतु से आप (दाशुषे) निर्लोभता से उत्तम-उत्तम पदार्थों के दान करनेवाले मनुष्य के लिये (भद्रम्) कल्याण, जो कि शिष्ट विद्वानों के योग्य है, उसको (करिष्यसि) करते हैं, सो यह (तवेत्) आप ही का (सत्यम्) सत्यव्रत=शील है ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो न्याय, दया, कल्याण और सब का मित्रभाव करनेवाला परमेश्वर है, उसी की उपासना करके जीव इस लोक और मोक्ष के सुख को प्राप्त होता है, क्योंकि इस प्रकार सुख देने का स्वभाव और सामर्थ्य केवल परमेश्वर का है, दूसरे का नहीं। जैसे शरीरधारी अपने शरीर को धारण करता है, वैसे ही परमेश्वर सब संसार को धारण करता है, और इसी से इस संसार की यथावत् रक्षा और स्थिति होती है ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दाश्वान् का कल्याण

पदार्थान्वयभाषाः - हे ( अङ्ग ) - सम्पूर्ण वस्तुओं को प्राप्त करानेवाले प्रभो । [अगि गतौ - गति - प्राप्ति] ( अग्ने ) सबके अग्रणी प्रभो! आप ( यत् ) - जो यह नियम करते हैं कि ( दाशुषे ) - दाश्वान् [दादाने] के लिए, देनेवाले के लिए अथवा आपके प्रति अपना अर्पण करनेवाले के लिए [वस्तुतः धन को देकर ही तो हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करते हैं, Mammon [धनदेव] व God [महादेव] दोनों की उपासना इकठे थोड़े हुआ करती है! इस दाश्वान् के लिए] ( त्वम् ) [Thou]=आप ( भद्रम् ) - कल्याण को "यद्वै पुरुषस्य वित्तं तद् भद्रं गृहा भद्रं प्रजा भद्रं पशवों भद्रम्' - वित्त - गृह - पशुरूप भद्र को  ( करिष्यसि ) करेंगे  ( तव ) - आपका  ( तत् ) - यह नियम ( इत् ) - निश्चय से ( सत्यम् ) - सत्य है और इस नियम के द्वारा उस दाश्वान् के अंग - प्रत्यंगों में रस का जीवनीशक्ति का संचार करते हुए आप सचमुच 'अंगिरः' - [अंगिरस] अंगों में रस का संचार करनेवाले हैं, जीवन देनेवाले हैं ।  एक बालक माता - पिता के प्रति अपना अर्पण कर देता है - अपनी इच्छा को उनकी इच्छा में मिला देता है तो माता - पिता उसका अधिक ध्यान करते हैं और उसका उत्तम निर्माण करते हैं । इसी प्रकार जब एक दाश्वान् पुरुष प्रभु के प्रति अपने को अर्पित कर देता है तो प्रभु का वह अधिक प्रिय होता है और प्रभु उसे सब आभ्युदयिक वस्तुएँ प्राप्त कराते हैं । जीव की अल्पज्ञता से जीव द्वारा धारण किया गया ऐसा कोई व्रत टूट भी जाए, तदपि परमात्मा का व्रत उसके पूर्ण ज्ञान के कारण टूट नहीं जाता । जीव अल्पज्ञता से कोई ग़लत वस्तु भी दे देता है, परन्तु प्रभु ठीक ही वस्तु देते हैं ।
भावार्थभाषाः - प्रभु दाश्वान् का कल्याण करते हैं - यह उनका सत्य व्रत है ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथैकः परमार्थ उपदिश्यते।

अन्वय:

हे अङ्गिरोऽअङ्गाग्ने! त्वं यस्मात् दाशुषे भद्रं करिष्यसि करोषि, तस्मात्तवेत्तवैवेदं सत्यं व्रतमस्ति ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) यस्मात् (अङ्ग) सर्वमित्र (दाशुषे) सर्वस्वं दत्तवते (त्वम्) मङ्गलमयः (अग्ने) परमेश्वर ! (भद्रम्) कल्याणं सर्वैः शिष्टैर्विद्वद्भिः सेवनीयम्। भद्रं भगेन व्याख्यातं भजनीयं भूतानामभिद्रवणीयं भवद्रमयतीति वा भाजनवद्वा। (निरु०४.१०) (करिष्यसि) करोषि। अत्र वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति लडर्थे लृट्। (तव इत्) एव (तत्) तस्मात् (सत्यम्) सत्सु पदार्थेषु सुखस्य विस्तारकं सत्प्रभवं सद्भिर्गुणैरुत्पन्नम् (अङ्गिरः) पृथिव्यादीनां ब्रह्माण्डस्याङ्गानां प्राणरूपेण शरीरावयवानां चान्तर्य्यामिरूपेण रसरूपोऽङ्गिरास्तत्सम्बुद्धौ। प्राणो वा अङ्गिराः। (श०ब्रा०६.३.७.३) देहेऽङ्गारेष्वङ्गिरा अङ्गारा अङ्कना अञ्चनाः। (निरु०३.१७) अत्राप्युत्तमानामङ्गानां मध्येऽन्तर्यामी प्राणाख्योऽर्थो गृह्यते ॥६॥
भावार्थभाषाः - यो न्यायकारी सर्वस्य दयालुः सुहृत्सन् कल्याणकर्त्ता सर्वस्य सुखमिच्छुः परमेश्वरोऽस्ति, तस्योपासनेन जीव ऐहिकपारमार्थिकं सुखं प्राप्नोति, नेतरस्य। कुतः, परमेश्वरस्यैवैतच्छीलवत्त्वेन समर्थत्वात्। योऽभिव्याप्याङ्गान्यङ्गीव सर्वं विश्वं धारयति, येनैवेदं जगद्रक्षितं यथावदवस्थापितं च सोऽङ्गिरा भवतीति। अत्राङ्गिरःशब्दार्थो विलसनाख्येन भ्रान्त्यान्यथैव व्याख्यात इति बोध्यम् ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, life of life, surely you would do good to the person who is generous and giving. Dear as the breath of life, this is ever true of your divine nature.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The One reality in taught in the 6th Mantra.

अन्वय:

O God, Friend of all, O Inner Soul of the universe and the human soul, O life of our life, to the person who gives himself up to Thee-offers to Thee everything that he has surrendering himself to Thee completely, Thou dost confer all good things ( including the bliss of emancipation ). To grant such great gifts is quite in accordance with Thy Divine Nature — that is Thy vow.

भावार्थभाषाः - God is the Dispenser of Justice, the kind Friend and well-wisher of all. It is only by meditating on Him that the human soul attains happiness in this world and in the next, because to bestow happiness on righteous persons is the very nature of this Almighty God, the Illuminator of all and none else has the power to do so.
टिप्पणी: God is called अंगिरा: (Angirah), because He is the very Life of all worlds and as Inner Self of all beings is Life of our life. पृथिव्यादीनां ब्रह्माण्डस्यांगानां प्राणरूपेण शरीरावयवानां च अन्तर्यामिरूपेण रसरूपो अंगिरारतत्सम्बुद्धौ | प्राणो वा अंगिराः (शत० ६. ३. ७. ३) उत्तमानामंगानां मध्येऽन्तर्यामी प्राणाख्योऽर्थो गृहयते । The meaning of the word Angirah has been wrongly given by Wilson in his notes as "The designation of a Rishi, the founder of a family or of a school. "His whole translation of the Mantra is wrong as it is against the very spirit of the Vedic teachings. It is "Whatever good thou mayest. Agni, bestow upon the giver (of the oblation), that verily, Angiras" shall revert to thee" unfortunately, he has not been able to grasp the spirit of the Mantra showing perfect confidence in God as the Life of our life, as indicated by Rishi Dayananda.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जो न्यायी, दयाळू, कल्याणयुक्त व सर्वांशी सुहृदभावाने वागणारा परमेश्वर आहे, त्याचीच उपासना करून जीव ईहलोक व मोक्षाचे सुख प्राप्त करतो. या प्रकारे सुख देण्याचा स्वभाव व सामर्थ्य केवळ परमेश्वराचे आहे. दुसऱ्याचे नाही. जसे शरीरधारी आपल्या शरीराला धारण करतो तसेच परमेश्वर सर्व संसार धारण करतो. यामुळे या जगाचे योग्य प्रकारे रक्षण व स्थापन होते. ॥ ६ ॥