जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (माता) निर्माण करनेवाली [पृथिवी] (दक्षिणायाः) [अपनी] शीघ्र गति से (धुरि)) कष्ट में (युक्ता) युक्त (आसीत्) हुई, (गर्भः) गर्भ [के समान सूर्य] (वृजनीषु अन्तः) रोकने की शक्तियों [आकर्षणों] के भीतर (अतिष्ठत्) स्थिर हुआ। (वत्सः) निवासदाता [सूर्य] ने (विश्वरूप्यम्) सब रूपों [श्वेत, नील, पीत आदि सात वर्णों] में रहनेवाली (गाम्) किरण को (त्रिषु) तीनों [ऊँचे, नीचे और मध्य] (योजनेषु) लोकों में (अनु) अनुकूलता से (अमीमेत्) फैलाया और [उन लोकों को] (अपश्यत्) बाँधा [आकर्षित किया] ॥९॥
भावार्थभाषाः - दूरदर्शी परमेश्वर ने पृथिवी की गति विचल न होने के लिये सूर्य को ऐसा बनाया कि जैसे गर्भ का बालक माता के उदर को पकड़े रहता है, वैसे ही सूर्य भूमि आदि लोकों को अपनी श्वेत, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश और चित्र किरणों द्वारा अपने आकर्षण में रखता है ॥