जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अचिकित्वान्) अज्ञानी मैं (चिकितुषः) ज्ञानवान् (कवीन्) बुद्धिमानों को (चित्) ही (अत्र) इस (ब्रह्म विषय) में (पृच्छामि) पूँछता हूँ, (विद्वान्) विद्वान् (विद्वनः) विद्वानों को (न) जैसे [पूँछता है](यः) जिस [परमेश्वर] ने (इमा) इन (षट्) छह [पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और ऊपर नीचे] (रजांसि) लोकों को (वि) अनेक प्रकार (तस्तम्भ) थाँभा था, (अजस्य) [उस] जन्मरहित [परमेश्वर] के (रूपे) स्वरूप में (किम् स्वित्) कौन सा (अपि) निश्चय करके (एकम्) एक [सर्वव्यापक ब्रह्म था]।अथवाजिस [सूर्य] ने इन छह लोकों को थाँभा था, (अजस्य) [उस] चलनेवाले [सूर्य] के (रूपे) रूप [मण्डल] के भीतर कौन सा निश्चय करके एक [सर्वव्यापक ब्रह्म था] ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसे विद्वान् विद्वानों से पूँछते हैं, वैसे ही श्रद्धापूर्वक ब्रह्मजिज्ञासु ब्रह्मज्ञानियों से निश्चय करे कि क्या वह अकेला परब्रह्म है, जिस ने इन सब लोकों को रचकर नियम में रक्खा है, अथवा वह अकेला परमात्मा इस सूर्य में भी शक्ति दे रहा है, जो सूर्य अपने आकर्षण-धारण में अनेक लोकों को थाँभ रहा है, और वैसे ही जिस सूर्य को अनेक लोक थाँभ रहे हैं ॥७॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में १।१६४।६ है। (विद्वनः) के स्थान पर वहाँ [विद्मने] है ॥