जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (सप्त) सात [इन्द्रियाँ त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] (इमम्) इस (रथम्) रथ [वेगशील वा रथसमान शरीर] में (अधि तस्थुः) ठहरे हैं, [वे ही] (सप्त) सात (अश्वाः) अश्व [व्यापनशील वा घोड़ों समान त्वचा, नेत्र आदि] [उस] (सप्तचक्रम्) सात चक्रवाले [चक्रसमान काम करनेवाले त्वचा, नेत्र आदि से युक्त रथ अर्थात् शरीर] को (वहन्ति) ले चलते हैं। [वही] (सप्त) सात (स्वसारः) अच्छे प्रकार चलनेवाली, [वा शरीर को चलानेवाली वा बहिनों के समान हितकारी त्वचा, नेत्र आदि] (अभि) सब ओर से [वहाँ] (सम् नवन्त=०−न्ते) मिलती हैं (यत्र) जहाँ [हृदयाकाश में] (गवाम्) इन्द्रियों के (सप्त) सात (नाम=नामानि) झुकाव [स्पर्श, रूप, शब्द, रस, गन्ध, मनन और ज्ञान, सात आकर्षण] (निहिता) धरे गये हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने शरीर में त्वचा नेत्र आदि सात इन्द्रियाँ [म० १] और स्पर्श, रूप आदि इनके सात गुण कैसे दिव्य बनाये हैं, जिनके द्वारा मनुष्य महाज्ञानी होकर मोक्षसुख पाता है ॥३॥ (नवन्त) के स्थान पर ऋग्वेद में [नवन्ते] है ॥