जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्र) जिस (विदथा) ज्ञान के भीतर (सुपर्णाः) सुन्दर पालन करनेवाले [वा सुन्दर गतिवाले, प्राणी] (अमृतस्य) अमृतपन [मोक्षसुख] के (भक्षम्) भोग को (अनिमेषम्) लगातार (अभिस्वरन्ति) सब ओर से पाते हैं। (एना) इसी विज्ञान के साथ (विश्वस्य) सब (भुवनस्य) संसार का (गोपाः) रक्षक (सः) वह (धीरः) धीर [बुद्धिमान् परमेश्वर] (पाकम्) पक्के मनवाले (मा) मुझ में (अत्र) इस [देह] के भीतर (आ) यथावत् (विवेश) पैठा है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार योगी जन परमात्मा के विज्ञान से मोक्ष सुख भोगते हैं, वैसे ही प्रत्येक उपासक दृढबुद्धि हो मोक्ष सुख प्राप्त करे ॥२२॥ यह मन्त्र निरुक्त ३।१२। में भी व्याख्यात है ॥ (भक्षम्, एना) के स्थान पर [भागम्, इनः] पद हैं, ऋग्वेद मन्त्र २१ ॥