जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्मिन्) जिस (वृक्षे) स्वीकरणीय [परमात्मा] में (मध्वदः) मधु [वेदज्ञान] चखनेवाले (विश्वे) सब (सुपर्णाः) सुन्दर पालनेवाले [प्राण वा इन्द्रियाँ] (निविशन्ते) भीतर पैठ जाते हैं (च) और (अधि) ऐश्वर्य के साथ (सुवते) उत्पन्न [उदय] होते हैं। (तस्य) उस [परमात्मा] के (यत्) जिस (पिप्पलम्) पालन करनेवाले [मोक्षपद] को (अग्रे) सब से आगे [बढ़िया] (स्वादु) स्वादु [चखने योग्य] (आहुः) वे [तत्त्वज्ञानी] बताते हैं, (तत्) उस [मोक्षपद] को वह मनुष्य (न उत्) कभी नहीं (नशत्) पाता, (यः) जो (पितरम्) पिता [पालनकर्ता परमेश्वर] को (न) नहीं (वेद) जानता है ॥२१॥
भावार्थभाषाः - सबके आश्रयदाता स्वीकरणीय परमात्मा को जब मनुष्य अपने श्वास-प्रश्वास में भीतर-बाहिर साक्षात् करता है, तब मोक्ष पद पाता है, उसको अज्ञानी पाखण्डी नहीं पा सकता ॥२१॥ (यत्) के स्थान पर [इत्] है, ऋग्वेद म० २२ ॥