जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (द्वा) दोनों [ब्रह्म और जीव] (सुपर्णा) सुन्दर पालन वा पूर्तिवाले [अथवा सुन्दर पक्षोंवाले पक्षीरूप], (सयुजा) एक साथ मिले हुए और (सखाया) [समान ख्यातिवाले] मित्र होकर (समानम्) एक ही (वृक्षम्) स्वीकरणीय [कार्य कारण रूप वा पेड़ रूप संसार] में (परि) सब प्रकार (सस्वजाते) चिपटे रहते हैं। (तयोः) उन दोनों में से (अन्यः) एक [जीव] (स्वादु) चखने योग्य (पिप्पलम्) [पालन वा पूर्ति करनेवाले] फल को (अत्ति) खाता है, (अनश्नन्) न खाता हुआ (अन्यः) दूसरा [परमात्मा] (अभि) सब ओर [सृष्टि और प्रलय में] (चाकशीति) चमकता रहता है ॥२०॥
भावार्थभाषाः - तीनों ब्रह्म और जीव और जगत् का कारण अनादि सनातन हैं। ब्रह्म और जीव व्यापक और व्याप्य भाव से संसार के बीच मित्रसमान चले आते हैं। जीव कार्यरूप जगत् में शरीर धरकर पुण्य-पाप का फल भोगता है। सर्वशासक परमेश्वर सृष्टि और प्रलय में एक रस बना रहता है ॥२०॥ यह मन्त्र निरुक्त १४।३०। और मुण्डकोपनिषद्, मुण्डक ३ खण्ड १। मन्त्र १ में भी व्याख्यात है ॥