जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सप्त) सात [इन्द्रियाँ त्वचा आदि-म० १] (एकचक्रम्) एक चक्रवाले [अकेले पहिये के समान काम करनेवाले जीवात्मा से युक्त] (रथम्) रथ [वेगशील वा रथ समान, शरीर] को (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं, (एकः) अकेला (सप्तनामा) सात [त्वचा आदि इन्द्रियों] से झुकनेवाला [प्रवृत्ति करनेवाला] (अश्वः) अश्व [अश्वरूप व्यापक जीवात्मा] (त्रिनाभि) [सत्त्व, रज और तमोगुण रूप] तीन बन्धनवाले (अजरम्) चलनेवाले [वा जीर्णतारहित], (अनर्वम्) न टूटे हुए (चक्रम्) चक्र [चक्रसमान काम करनेवाले अपने जीवात्मा] को [उस परमात्मा में] (वहति) ले जाता है (यत्र) जिस [परमात्मा] में (इमा) यह (विश्वा) सब (भुवना) लोक (अधि) यथावत् (तस्थुः) ठहरे हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - अकेला अपने पुरुषार्थ का भोगनेवाला जो निश्चल ब्रह्मचारी त्वचा आदि सात इन्द्रियों से सम्पन्न होकर सत्त्वादि तीनों गुणों को साक्षात् कर लेता है, वह जगदीश्वर परमात्मा में पहुँच कर आनन्द पाता है ॥२॥ १−यह मन्त्र आगे आया है-अ० १३।३।१८ ॥ २−भगवान् यास्कमुनि के अनुसार अर्थ-निरु० ४।२७ ॥ (सप्त) सात [किरण] (एकचक्रम्) अकेले चलनेवाले (रथम्) रथ [रंहणशील सूर्य] को (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं, (एकः) अकेला (सप्तनामा) सप्तनामा [जिसके लिये सात किरणें रसों को झुकाती हैं] (अश्वः) अश्व [व्यापक सूर्य] (अजरम्) न जीर्ण होनेवाले, (अनर्वम्) विना सहारेवाले (त्रिनाभि) तीन नाभियों [तीन ऋतुओं, ग्रीष्म, वर्षा, और हेमन्त] वाले (चक्रम्) चक्र [संवत्सर] को (वहति) ले जाता है, (यत्र) जिसमें [अर्थात् संवत्सर में] (इमा विश्वा भुवना) यह सब भूत [प्राणी] (अभितस्थुः) यथावत् ठहरते हैं ॥