जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [इस चक्ररूप संसार में] (ये) जो [लोक] (अर्वाञ्चः) नीचे जानेवाले हैं, (तान् उ) उन्हीं को (पराचः) ऊपर जानेवाले (आहुः) कहते हैं, और (ये) जो (पराञ्चः) ऊपर जानेवाले हैं (तान् उ) उन्हीं को (अर्वाचः) नीचे जानेवाले (आहुः) कहते हैं। (इन्द्रः) हे परमेश्वर ! (च) और (सोम) हे जीवात्मा ! (या) जिन [व्रतों] को (चक्रथुः) तुम दोनों ने बनाया था, (तानि) वे [व्रत] संसार को (वहन्ति) ले चलते हैं, (न) जैसे (धुरा) धुर [जूए] से (युक्ताः) जुते हुए [घोड़े आदि, रथ को ले चलते हैं] ॥१९॥
भावार्थभाषाः - जैसे ईश्वर के आकर्षण और धारण विशेष से सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, नक्षत्र आदि एक दूसरे से ऊँचे वा नीचे दिखाई देते हैं, वैसे ही जीव भी अपने कर्मों के अनुसार ईश्वरनियम से एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँचे-नीचे होते हैं। यह संसार इसी नियम पर चल रहा है, जैसे जूए में जुते घोड़े आदि से रथ चलता है ॥१९॥