जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (साकंजानाम्) एक साथ उत्पन्न हुओं में से (सप्तथम्) सातवें [जीवात्मा] को (एकजम्) अकेला उत्पन्न हुआ (आहुः) वे [तत्त्वदर्शी] बताते हैं, [और कि] (षट्) छह [कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका पाँच ज्ञानेन्द्रिय और मन] (इत्) ही (यमाः) नियम में चलानेवाले (ऋषयः) [अपने विषयों को देखनेवाली] इन्द्रिय (देवजाः) देव [गतिशील जीवात्मा] के साथ उत्पन्न होनेवाले हैं, (इति) यह [वे बताते हैं]। (तेषाम्) उन, [इन्द्रियों] के (विहितानि) विहित [ईश्वर के ठहराये] (विकृतानि) विविध प्रकारवाले (इष्टानि) इष्ट कर्म (स्थात्रे) अधिष्ठाता [जीवात्मा] के लिये (धामशः) स्थान-स्थान में और (रूपशः) प्रत्येक रूप में (रेजन्ते) चमकते हैं ॥१६॥
भावार्थभाषाः - कर्मफल के अनुसार अकेले जीवात्मा के साथ सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होकर उसके वश में रहकर अनेक विषयों को प्रकाशित करती हैं। इसी से जितेन्द्रिय पुरुष परम आनन्द प्राप्त करते हैं ॥१६॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में २५ है और निरु० १४।१९। में व्याख्यात है−“एक साथ उत्पन्न हुए छह इन्द्रियों में आत्मा सातवाँ है ॥ और निरु० १२।३७। में वर्णन है−“सात ऋषि शरीर में रक्खे हुए छह इन्द्रियाँ और सातवीं विद्या आत्मा में ॥