जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तान् उ) उन ही [जीवात्माओं] को (पुंसः) पुरुष और (स्त्रियः सतीः) स्त्रियाँ होते हुए (मे) मुझसे (आहुः) वे [तत्त्वदर्शी] कहते हैं, (अक्षण्वान्) आँखोंवाला [यह बात] (पश्यत्=०-ति) देखता है, (अन्धः) अन्धा (न) नहीं (वि चेतत्-०-ति) जानता है। (यः) जो (पुत्रः) पुत्र (कविः) बुद्धिमान् है, (सः) उसने (ईम्) इस [अर्व वा जीवात्मा को] (आ) भली-भाँति (चिकेत) जान लिया है, (यः) जो [पुरुष] (ता=तानि) उन [तत्त्वों] को (विजानात्) जान लेता है, (सः) वह (पितुः) पिता का (पिता) पिता [उपदेशक] (असत्) होता है ॥१५॥
भावार्थभाषाः - प्राणियों के आत्माओं में स्त्रीपन, पुरुषपन और नपुंसकपन नहीं है, जैसा शरीर होता है वैसा ही आत्मा भान होने लगता है। इसी प्रकार जगत्पिता परमात्मा में भी स्त्री-पुरुष और नपुंसक का चिह्न नहीं है। इस गूढ़ मर्म को तत्त्वदर्शी साक्षात् करते हैं ॥१५॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में १६ वाँ है और निरुक्त १४।२०। में भी व्याख्यात है। इस मन्त्र के उत्तर भाग का मिलान अ० २।१।२। में करो ॥ इस मन्त्र पर श्री सायणाचार्य ने यह श्लोक उद्धृत किया है ॥ नैव स्त्री न पुमानेष नैव चायं नपुंसकः। यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स चोद्यते ॥१॥ यह न तो स्त्री है न पुरुष है और न यह नपुंसक ही है। जिस-जिस शरीर को पाता है, उस-उसके साथ वही कहा जाता है ॥१॥